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ताने से आहत सेठ ने जयपुर की तर्ज पर बसाया रतननगर, जानें कस्बे से जुड़ी खास बातें

तपते धोरों के रूप में पहचाने जाने वाले चूरू जिले से नौ किमी की दूरी पर बसा है छोटा सा कस्बा रतननगर। यह कस्बा भी अपने में गर्विले इतिहास को समेटे हुए है। इस अतीत को अपने में समेटे इस कस्बे की पहचान करीब पौने दो सौ साल पहले जयपुर की तर्ज पर की गई इसकी बसावट है।

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चूरू

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kamlesh sharma

Feb 05, 2023

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चूरू। तपते धोरों के रूप में पहचाने जाने वाले चूरू जिले से नौ किमी की दूरी पर बसा है छोटा सा कस्बा रतननगर। यह कस्बा भी अपने में गर्विले इतिहास को समेटे हुए है। इस अतीत को अपने में समेटे इस कस्बे की पहचान करीब पौने दो सौ साल पहले जयपुर की तर्ज पर की गई इसकी बसावट है। इसकी बड़ी खासियत ये है कि इसके चारों तरफ सुरक्षा के लिए जयपुर के जैसे चार किमी लंबाई का परकोटा बनाया हुआ है।

जिसे यहां की आमबोली में सफील या शहर पनाह की दीवार कहा जाता है। कस्बे के लोगों ने बताया कि पांच फीट चौड़ी दीवार की ऊंचाई करीब 15 फीट है। इतिहास पर अनुसंधान कर रहे डा. केसी सोनी ने बताया कि शेखावाटी अंचल के गांव परसरामपुरा से आकर सेठ नंदराम केडिया ने विसं 1917 में गांव की स्थापना की। गांव बसाने को लेकर एक कहावत और प्रचलित है कि केडिया परिवार की ओर से परसरामपुरा बसाया था। वो बस नहीं पाया तो लोगों ने ताना दिया कि गांव बसायो बाणियों पार पड़े जब जाणियों। इसी वजह ने उनको मजबूत बनाया और इसके रतननगर को उन्होंने सलीके से बसाया। उन्होंने बताया कि गांव बसने के वक्त उस समय हर कौम के 72 परिवार साथ आए थे।


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चार ब्लॉक में बसा है कस्बा..
कस्बे की नींव गंगाबाई के हाथों से चांदी की करणी से रखवाई गई थी। फिर वास्तु के हिसाब से चार ब्लॉक में कस्बे को बसाया गया। कस्बे की सुरक्षा के लिए चार कोनों पर बुर्जें बनवाई गई। जिसमें दक्षिण-पश्चिम दिशा की बुर्ज सबसे बड़ी व उत्तरी - पूर्वी दिशा में सबसे छोटी बनाई गई। बुर्जों के नाम भी लोक देवाताओं के नाम पर रखे गए। दो बुर्जें तोप रखने के लिए बनवाई गई थीं। जिनसे दिन में दो बार गोले दागकर सलामी दी जाती थी। उन्होंने बताया कि केडिया परिवार के जयपुर राजघराने से अच्छे संबंध होने के चलते कस्बे को जयपुर के जैसे वर्गाकार बसाया गया।

अनबन होने पर सेठ ने बसाया कस्बा
इतिहास के जानकार सोनी ने बताया कि बिसाऊ मूल के सेठ नंदराम केडिया ने की बिसाऊ के ठाकुर श्यामसिंह से अनबन हो गई थी। कस्बे का नाम बीकानेर रियासत के तत्कालीन राजा सरदारसिंह के पिता रतनसिंह के नाम पर रतनगर रखा गया था। उन्होंने बताया कि राजा ने आस-पड़ौस के गांवों से अधिगृहित कर कस्बे के लिए 71 हजार बीघा जमीन आंवटित की थी। जिसमें से 6 हजार बीघा जमीन गोचर के लिए कायम की थी जो आज वन विभाग के अधीन है।

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कस्बे से जुड़ी है कई खास बातें...

- पूर्वी-उत्तरी ब्लॉक में 14, पूर्वी - दक्षिणी ब्लॉक में 22, उत्तर पश्चिम में 8 व दक्षिण में 4 हवेलियां बनीं है।

- परकोटे की सुरक्षा के लिए कस्बे के चारों और चार बड़े मुख्य प्रवेशद्वार बनाए गए।

- कस्बे की सीमाएं चूरू, देपालसर,मेघसर, थैलासर,हणुतपुरा, ऊंटवालिया व बीनासर आदि गांवों से लगती है।

- कस्बे के चौराहे आपस में एक - दूसरे से मिलते हैं व सभी भूखंड 110 गुणा 220 साइज के हैं।

- चौराहों व परकोटे की भीतरी दीवार के पास के चारों तरफ खाली छोड़ी जमीन पर पीपल व नीम के पेड़ लगाए गए।