
गांव वालों ने टोका, लेकिन नहीं माना, कोच की जिद ने बेटियों को पहुंचाया राष्ट्रीय स्तर तक
रमेश गौड़
सरदारशहर. करीब चार साल पहले गांव बिजरासर के कबड्डी खिलाड़ी राजेन्द्र पोटलिया ने कबड्ड़ी में युवाओं को मैदान में उतारने का सपना देखा। लेकिन बेटे पोटलिया की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे। फिर भी पोटलिया ने हिम्मत नहीं हारी और बेटियों को मैदान में उतारने का निर्णय लिया। पोटलिया के इस निर्णय पर गांव के लोगों ने खूब ताने कसे लेकिन उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने मिशन में लगे रहे। नतीज ये रहा कि आज गांव की करीब एक दर्जन बेटियां कबड्डी में नेशनल स्तर पर पहुंच चुकी हैं। कल जो लोग ताने मारते थे वे आज पोटलिया के प्रयास की तारीफ करते नजर आते हैं। सरदारशहर से 35 किलोमीटर दूर गांव बिजारासर की बेटियां अब कबड्डी के क्षेत्र में नई इबारत लिख रही हैं। बेटियों की यह सफलता इतनी आसान भी नहीं थी। इस सफलता के पीछे इन बेटियों ने कड़ा संघर्ष किया, गांव वालों के ताने सुने और न जाने क्या-क्या इन बेटियों के घर वालों को सुनना पड़ा, लेकिन घरवालों ने साथ दिया और बेटियों ने अपने घर वालों को पहचान दिलाई। कहने पर कि हमारी छोरियां भी किसी छोरों से कम नहीं। आज पूरा बिजरासर गांव इन बेटियों के साथ खड़ा है। गांव में कोई खेल खेला जाता है तो वह कबड्डी है। बिजरासर के गांव में कबड्डी को धर्म की तरह माने जाना लगा है। जब लड़कियां कबड्डी के मैदान में उतरती हैं। तो पूरा गांव एक जगह इकट्ठा होकर कबड्डी मैच देखता है। बिजरासर गांव की आठ बेटियां नेशनल स्तर पर कबड्डी खेल चुकी हैं। जबकि 12 बेटियां राज्य स्तर पर। गत राष्ट्रीय कबड्डी प्रतियोगिता में राजस्थान की कबड्डी टीम में दो बेटियां बिजरासर की शामिल थीं। वहीं चूरू जिले में पिछले चार सालों से बिजरासर की बेटियों का ही कब्जा है। सरदारशहर के छोटे से गांव से निकलकर यह बेटिया दिल्ली, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में भी कबड्डी के मैदान में प्रतिभा के झण्डे गाड़ चुकी है।
राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाली बिजरासर की बेटिया
उर्मिला पोटलिया, सीता पोटलिया, पूनम पोटलिया, सुमित्रा पोटलिया, बसंती स्वामी, पूजा जाखड़, सुमित्रा स्वामी व ललिता पोटलिया
राज्य स्तर पर खेलने वाली बेटियां
विनोद पोटलिया, पूनम सिहाग, अनसुइया पोटलिया, गायत्री पोटलिया, रुकममण सारण, तुलसी सारण, अंजना पोटलिया, संपत सुथार, पूजा मेघवाल, प्रियंका मेघवाल, कृष्णा पोटलिया, कविता स्वामी, मनीषा भोभिया व पूजा सारण ने भाग लिया।
अपने घर की बेटियों से की शुरुआत
जब गांव के लड़के कबड्डी में सफल नहीं हुए तो राजेंद्र ने लड़कियों के साथ एक कबड्डी की टीम बनाने कि मन में ठानी। लेकिन शुरू में गांव में कोई भी अपनी बेटियों को कबड्डी खिलाने को राजी नहीं हुआ। तब राजेंद्र ने अपनी दो बेटियों को और अपनी छोटी बहन को कबड्डी के मैदान में उतारा। इसके बाद धीरे-धीरे गांव की अन्य बेटियां भी कबड्डी खेलने के लिए आने लगी। गांव के अलावा लड़कियों के घर वाले भी कहते कबड्डी लड़कों का खेल है लड़कियों का नहीं। लेकिन गांव की बेटियों ने हार नहीं मानी और गुरु राजेंद्र के नेतृत्व में मेहनत करती रहीं और इन्होंने सफलता के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए। आज इन बेटियों पर पूरा गांव नाज करता है।
सुबह चार बजे दौडऩे जाती हैं बेटियां
कबड्डी के मैदान में सफल होने के लिए बेटियां कड़ी मेहनत करती हैं। इनके परिजनों ने बताया कि सुबह चार बजे उठकर दौडऩे चली जाती हैं। फिर कबड्डी के मैदान में प्रैक्टिस करती हैं। जिसके बाद यह बेटियां घर आकर घर के काम में घर वालों का हाथ भी बंटाती हैं। फिर यह स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई भी करती हैं। हालत ये है कि गांव में इनके खेलने के लिए कोई अच्छा मैदान नहीं है।
एक ताने ने बदल दी बेटियों की किस्मत
बात दरअसल 2014 की है जब बिजरासर के लड़कों की कबड्डी की टीम राजेंद्र पोटलिया के नेतृत्व में पास ही के गांव में कबड्डी का मैच खेलने के लिए गई। उस दिन टीम को सफलता नहीं मिली और हार का मुंह देखना पड़ा। हार के साथ-साथ पड़ोस के गांव वालों ने राजेंद्र पोटलिया को ताना मार दिया की कबड्डी का खेल कोई बच्चों का खेल नहीं है। तब कबड्डी के कोच राजेंद्र को यह बात चुभ गई और उन्होंने ठान लिया कि वे एक ऐसी टीम बनाएंगे जो ना सिर्फ शहर, जिले में बल्कि देश में गांव का नाम रोशन करेगी। इसके बाद राजेंद्र ने लड़कों पर काफी मेहनत की लेकिन लड़के राजेंद्र की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। फिर उन्होंने असंभव को संभव बनाया और लड़कियों को कबड्डी के मैदान में उतार दिया और लड़कियों ने एक के बाद एक गांव से लेकर शहर तक और जिले से लेकर प्रदेश तक जीत के झंडे गाड़ दिए।
Updated on:
02 Feb 2019 12:03 pm
Published on:
01 Feb 2019 11:15 am
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