चूरू. राजस्थान हमेशा ही कला संस्कृति के लिए जाना जाता है यहां पुरानी कथाओं व परम्पराओं के आधार पर अनेक रस्मो रिवाज निभाई जात है। राजस्थान धरातल भीषण गर्मी व दोनों के साथ साथ संस्कृति की छाप आज भी संजोय रखता है । वैसे तो राजस्थान में पेड़ पौधे कम ही है लेकिन यहां के पूर्वज उनको बचाने के लिए अनेक मान्यता रखते थे क्योंकि राजस्थान प्रदेश में पिंपल, नीम, खेजड़ी आदि वृक्ष मुख्य रूप से पाए जाते हैं। वही अक्सर आपने शाही शादी या अनेक रस्मो की शादियां तो सुनी ही होगी लेकीन क्या आपने कभी पेड़ो की शादियां देखी है नहीं देखी तो आज आपको राजस्थान के चूरू जिले के तारानगर तहसील के गांव खरतवास में हुई ऐसी अनोखी शादी की बात बताते है जहा पीपल और खेजड़ी के पेड़ों की अनोखी शादी हुई। इस शादी में बाराती थे क्षेत्र के गांवों के सैकड़ों ग्रामीण। डीजे, ढोल नगाड़ों और मांगलिक गीतों के बीच पीपल तथा खेजड़ी के पेड़ एक दूसरे के हो गए। लोगों का कहना है कि विवाह अनुष्ठान के बाद पेड़ सभी धार्मिक कार्यों के लिए पवित्र माने जाते हैं।
खरतवास गांव में पीपल के पेड़ तथा खेजड़ी के वृक्ष का विवाह कार्यक्रम धूमधाम से हुआ। विवाह से पूर्व षष्टी कर्म, नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह संस्कार हुए। बान, भात, पार्टी, बंदोरी आदि भी हुए। इसके बाद विवाह के लिए पीपल के पेड़ को दूल्हा तथा खेजड़ी के पेड़ को दुल्हन की तरह सजाया गया। इस मौके पर ढोल नगाड़ों व डीजे की धुन पर महिलाओ ने नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी। । इस मौके पर महिला संगीत भी हुआ।शादी का यह कार्यक्रम आयोजित करने वाले खेवाराम नैण बताया है कि पहले से ये इच्छा थी लेकीन करोना काल में हुई ऑक्सीजन की किल्लत के बाद उन्होंने यह निश्चय ही कर लिया क्योंकि कोरोना काल में ऑक्सीजन की काफ ी कमी हो गई थी उहोंने सोचा कि यदि मैं दो पेड़ बचाऊगा तो मेरे को देखिए कोई एक पेड़ भी बचायेगा तो गांवो में सैंकड़ों पेड़ जीवित रह सकते हैं।
वही गांव के ललित नैण ने बताया कि उनके ताऊजी की यही इच्छा थी कि वह पेड़ों को कैसे बचाएं तथा गांव में करीब 30 साल पहले भी ऐसे शादी हुआ करती थी जिसके बाद उन्होंने शादी की हर रस्म के साथ यह विवाह कार्यक्रम आयोजित किया है जिसमें बान बैठने से लेकर विदाई तक के समस्त कार्यक्रम किए जा रहे हैं उन्होंने बताया शादी में तकरीबन सात लाख का खर्चा आया है साथ ही शादी में हलवाई जोधपुर से लाए गए हैं वहीं अन्य रस्मो रिवाज के लिए आसपास के क्षेत्र से व्यक्तियों को लाकर करवाया कार्यक्रम। इस अनोखी शादी की कई गांव में चर्चा भी हैं
विवाह के बाद ही पूजा योग्य माना जाता है पीपल व खेजड़ी
खीवाराम नैण ने बताया कि परंपरा के अनुसार हिंदू रीति-रिवाजों में सभी धार्मिक कार्य पीपल के पेड़ में किए जा सकते हैं। विवाह करने के बाद ही यह वृक्ष पवित्र माना जाता है। शादी के बाद पीपल व खेजडी के पेड़ जल चढ़ाने, मनोकामना के लिए बंधन बांधने, पूजा करने के लिए पवित्र माना जाता है।