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रंग की वजह से इस भारतीय क्रिकेटर ने जिंदगी भर झेला अपमान, होटल में नहीं मिलती थी एंट्री, फैंस लगाते थे काली-काली के नारे

पाकिस्तान दौरे पर टीम ने जब उनका 17वां जन्मदिन मनाने के लिए केक मंगवाया तो एक साथी खिलाड़ी ने कहा कि इतने काले लड़के के लिए गहरा चॉकलेट केक एकदम सही है।

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भारत

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Siddharth Rai

Mar 25, 2026

शिवरामकृष्णन उस भारतीय टीम का हिस्सा थे, जिसने ऑस्ट्रेलिया में 1985 का बेंसन एंड हेजेस वर्ल्ड चैंपियनशिप ऑफ़ क्रिकेट जीता था। (Photo - EspnCricInfo)

17 साल की उम्र में पाकिस्तान दौरे पर जन्मदिन का केक काटते वक्त पूर्व भारतीय लेग स्पिनर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन की आंखें भर आई थीं। यह आंसू किसी खुशी के नहीं थे बल्कि एक साथी खिलाड़ी के उस जहरीले जुमले की वजह से थे जिसने उनके रंग पर तंज कसा था। शिवरामकृष्णन ने हाल ही में 'द इंडियन एक्सप्रेस' को दिए इंटरव्यू में अपनी जिंदगी के वो दर्दनाक पन्ने खोले जिनके बारे में शायद ही किसी को पता हो।

जन्मदिन पर मिला अपमान, गावस्कर ने थामा हाथ

पाकिस्तान दौरे पर टीम ने जब उनका 17वां जन्मदिन मनाने के लिए केक मंगवाया तो एक साथी खिलाड़ी ने कहा कि इतने काले लड़के के लिए गहरा चॉकलेट केक एकदम सही है। बस इतना काफी था।
शिवरामकृष्णन रो पड़े और उन्होंने केक काटने से इनकार कर दिया। उस मुश्किल घड़ी में महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने उन्हें समझाया और उन्होंने रोते हुए केक काटा। यह घटना कोई इकलौती घटना नहीं थी बल्कि एक लंबी तकलीफ की कड़ियों में से बस एक कड़ी थी।

14 साल की उम्र में जूते साफ करने का हुक्म मिला

शिवरामकृष्णन ने बताया कि जब वो मात्र 14 साल के थे तब चेपॉक मैदान पर भारत के एक बल्लेबाज ने उन्हें ग्राउंड स्टाफ का आदमी समझकर जूते साफ करने को कह दिया। तमिलनाडु के ड्रेसिंग रूम में बड़े खिलाड़ी उन्हें "करुपा" कहकर बुलाते थे।
उत्तर भारत में जब वो मैदान की सीमा पर फील्डिंग करते थे तो दर्शक "काली-काली" के नारे लगाते थे। पाकिस्तान में भी यही हाल था। पूरे एक महीने तक स्टेडियम में एक ही आवाज गूंजती रही, काली, काली, काली।

होटल के दरवाजे पर एक घंटा खड़ा रहा यह भारतीय क्रिकेटर

मुंबई के नरीमन पॉइंट स्थित ट्राइडेंट होटल के दरबान ने शिवरामकृष्णन को अंदर आने से रोक दिया। उस वक्त वो भारतीय टीम का हिस्सा थे, लेकिन दरबान को यकीन नहीं हुआ कि इस रंग और उम्र का लड़का भारतीय क्रिकेटर हो सकता है। वो करीब एक घंटे तक बाहर खड़े रहे जब तक कोई साथी खिलाड़ी आकर उनकी पहचान नहीं करवा गया।
उस वक्त उनकी उम्र सोलह साल थी। शिवरामकृष्णन बताते हैं कि उसके बाद उन्होंने सीख लिया कि चाबी हमेशा साथ रखनी है। लेकिन गेट के पास जाते ही हाथ-पांव कांपने लगते थे। वो डर हर बार लौट आता था।

मैं आईने में खुद को देखना नहीं चाहता था

शिवरामकृष्णन ने बताया कि इन तमाम घटनाओं का असर उनके भीतर इस कदर गहरा उतर गया था कि आत्मविश्वास जैसे पूरी तरह खत्म ही हो गया। वो खुद कहते हैं कि जब इतनी कम उम्र में किसी का आत्मसम्मान इस तरह टूटे तो उसे दोबारा जोड़ पाना बेहद मुश्किल होता है। उनके अपने शब्दों में वो बार-बार खुद से कहते रहे, भूल जाओ, भूल जाओ, भूल जाओ। लेकिन वो सब अवचेतन मन में जड़ें जमा चुका था और बार-बार सतह पर आ जाता था। वो खुद को आईने में देखना नहीं चाहते थे।

रात को नींद लाने का एकमात्र सहारा बन गई शराब

शिवरामकृष्णन ने कहा, "जागते हुए कुछ भी बर्दाश्त नहीं होता था। आप आंखें बंद करते हैं, तो आपको ऐसी तस्वीरें दिखाई देती हैं जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। सब कुछ बहुत डरावना होता है। आप आंखें खोलते हैं, तो वहां कुछ भी नहीं होता। लेकिन आप इतने थके हुए होते हैं कि आप सोना चाहते हैं। आप आंखें बंद करते हैं, तो फिर वही भयानक चीज़ें दिखती हैं। आंखें खोलते हैं तो कुछ भी नहीं। फिर आपको यकीन हो जाता है कि कुछ भी गलत नहीं है। आप आंखें बंद करते हैं। थोड़ी देर के लिए। फिर से। आंखें खोलते हैं। और इस तरह आपकी नींद उड़ जाती है…"

शिवरामकृष्णन ने कहा, "कभी-कभी, जब हम IPL के दौरान दुबई में सफ़र कर रहे होते थे, तो वहाँ कोई स्पीड लिमिट नहीं होती थी। अगर गाड़ी बहुत तेज़ चलती, तो मेरे मन में कुछ ऐसा आता कि मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर कूद जाऊन । न जाने कैसे, किसी चीज़ ने मुझे कोई भी बेवकूफ़ी भरा काम करने से रोक लिया।”