
गैरी सोबर्स, बिशन सिंह बेदी (Image: ANI)
19 मार्च 1968 का वह दिन वेस्टइंडीज क्रिकेट के इतिहास में एक बुरी याद बनकर दर्ज है। इंग्लैंड की टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर थी। पोर्ट ऑफ स्पेन के क्वींस पार्क ओवल में खेले जा रहे चौथे टेस्ट में वेस्टइंडीज की स्थिति मजबूत लग रही थी। कप्तान गैरी सोबर्स (Garry Sobers) ने पहली पारी 526/7 पर घोषित की थी और 122 रनों की बढ़त हासिल कर ली थी।
पांचवें और आखिरी दिन इंग्लैंड के सामने ड्रॉ के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा था, तभी सोबर्स ने एक ऐसा फैसला लिया जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। मैच को ड्रॉ की तरफ न ले जाकर जीत की गुंजाइश खोजते हुए उन्होंने अपनी दूसरी पारी मात्र 92/2 पर घोषित कर दी। अब इंग्लैंड को सिर्फ 165 मिनट में 215 रन बनाने थे, जो उस जमाने में खेल की गति के हिसाब से लगभग नामुमकिन था। मगर यह फैसला आगे चलकर वेस्टइंडीज को बहुत महंगा पड़ा।
इंग्लैंड के ड्रेसिंग रूम को भी भरोसा नहीं था कि वे इस लक्ष्य का सफल पीछा कर सकते हैं। कप्तान कॉलिन काउड्रे शुरुआत में रन-चेज के पक्ष में नहीं थे और ड्रॉ के लिए खेलने की योजना बना रहे थे, लेकिन जियोफ्री बॉयकॉट (Geoffrey Boycott) ने अपने साथियों का मनोबल बढ़ाया और जीत के लिए खेलने को कहा।
कहते हैं ना कि जब कोई जंग मनोभूमि में जीत ली जाए, तो समझो रणभूमि में भी जीत निश्चित है। ठीक वैसा ही हुआ। बॉयकॉट ने नाबाद 80 रन बनाए, जबकि काउड्रे ने 71 रनों का अहम योगदान दिया। इन पारियों की मदद से इंग्लैंड ने यह लक्ष्य सात विकेट और सिर्फ तीन मिनट शेष रहते हासिल कर लिया।
इस हार की वजह से वेस्टइंडीज ने सिरीज भी गंवा दी। मगर मामला खेल के मैदान तक सीमित नहीं रहा। इस फैसले के बाद सोबर्स की आलोचना पूरे वेस्टइंडीज में हुई और उनसे इस्तीफे तक की मांग की गई।
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में 11 बार ऐसा हुआ है जब किसी टीम ने तीसरी पारी घोषित की, लेकिन ऐसे आत्मविश्वास के बावजूद मैच हार गई। इस अनोखी सूची में वेस्टइंडीज का नाम तीन बार आता है - 1934-35 में ब्रिजटाउन में, 1967-68 में पोर्ट ऑफ स्पेन में, और 1975-76 में फिर से पोर्ट ऑफ स्पेन में। इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका ने दो-दो बार इस स्थिति का सामना किया है। न्यूजीलैंड, भारत और ऑस्ट्रेलिया एक-एक बार इस दुर्भाग्यपूर्ण सूची का हिस्सा बने हैं।
दिसंबर 1977 में ऑस्ट्रेलिया दौरे के दूसरे टेस्ट में भारत ने पर्थ के डब्ल्यूएसीए (WACA) मैदान पर पहली पारी में चेतन चौहान (88) और मोहिंदर अमरनाथ (90) की पारियों के बदौलत 402 रन बनाए। दूसरी पारी में कप्तान बिशन सिंह बेदी ने सुनील गावस्कर (127) और मोहिंदर अमरनाथ (100) के शतकों के बाद 330/9 पर घोषणा करते हुए ऑस्ट्रेलिया के सामने 339 रनों का लक्ष्य रखा। उस दौर में यह लक्ष्य काफी चुनौतीपूर्ण माना जाता था और भारत को जीत का प्रबल दावेदार समझा जा रहा था।
लेकिन ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों ने दबाव में शानदार खेल दिखाया और मात्र दो विकेट खोकर यह लक्ष्य हासिल कर लिया। नाइट वॉचमैन टोनी मान ने अप्रत्याशित शतक जड़ा और पीटर टूही ने 83 रनों का अहम योगदान दिया। गौरतलब है कि उस समय ऑस्ट्रेलियाई टीम कई दिग्गज खिलाड़ियों के वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट में जाने के कारण कमजोर मानी जा रही थी और 41 वर्षीय पूर्व कप्तान बॉब सिम्पसन को संन्यास से वापस बुलाकर टीम की कमान सौंपी गई थी। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया ने भारत की घोषणा का फायदा उठाकर जीत दर्ज की, और भारत उन 11 टीमों की सूची में शामिल हो गया जो तीसरी पारी घोषित करने के बाद टेस्ट मैच हार चुकी हैं।
Updated on:
19 Mar 2026, 6:57 PM IST
Published on:
19 Mar 2026, 5:49 PM IST
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