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दिल्ली: बत्रा हॉस्पिटल पर 5 लाख रुपए का जुर्माना, एक महीने तक डेडबॉडी को रखा था वेंटिलेटर पर

बत्रा हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक ब्रेन डेड मरीज को एक महीने तक वेंटिलेटर पर रखकर पैसा वसूला।

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Kapil Tiwari

Jun 24, 2018

Batra Hospital

Batra Hospital

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में अस्पतालों की लापरवाही के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली स्टेट कन्ज्यूमर रिड्रेसल कमिशन (DSCRC) ने दिल्ली के ही बत्रा हॉस्पिटल पर 5 लाख रुपए का जुर्माना ठोंका है। अस्पताल पर आरोप था कि अप्रैल 2006 में 14 साल के एक बच्चे को बिना किसी की सहमित के वेंटिलेटर पर रखा गया था, जिसके बाद परिवारवालों से मोटा पैसा वसूला गया। इसके बाद जब परिवारवालों पर पैसे खत्म हो गए तो अस्पताल ने बच्चे को मृत घोषित कर डेडबॉडी थमा दी।

ब्रेन डेड के बाद भी अस्पताल ने रखा वेंटिलेटर पर
दरअसल, 14 साल के प्रशांत नाम के एक लड़के को टाइफाइड और बुखार के बाद बत्रा हॉस्पिटल मेडिकल रिसर्च सेंटर में भर्ती किया गया था। यहां पहले तो उसका इलाज ठीक से किया गया, लेकिन जब बाद में उसका ब्रेड डेड हो गया तो अस्पताल वालों ने बिना किसी की सहमित के लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रख दिया। अपैल के महीने में ही लड़के की मौत हो गई थी, लेकिन डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर पर ही रखा, क्योंकि इस दौरान उनके पास पैसों की लगातार सप्लाई हो रही थी। एक महीने बाद उसे मृत घोषित कर दिया गया। बच्चे के परिवार ने आरोप लगाया कि अस्पताल ने उन्हें ये नहीं बताया कि बच्चा अप्रैल में ही ‘ब्रेन डेड’ हो चुका था।

बिना परिवार के परमिशन लड़के को रखा वेंटिलेटर पर
प्रशांत के परिवार का आरोप है कि लड़के का अप्रैल में ही ब्रेन डेड हो गया था और हॉस्पिटल ने उन्हें इस बारे में बताया भी नहीं था। इस मामले की सुनवाई दिल्ली स्टेट कन्ज्यूमर रिड्रेसल कमिशन (DSCRC) में चल रही थी। इस मामले की जांच कर रहे कमीशन के न्यायिक सदस्य एन पी कौशिक ने कहा कि प्रशांत के परिवार वालों को अस्पताल द्वारा उसकी हालत के बारे में नहीं बताया गया था। हालांकि न्यूरोलॉजिस्ट ने कहा था कि उसके ‘मस्तिष्क की कोशिकाओं में गतिविधि की जैवीय लक्षण नहीं दिखे’ थे।

जब तक मिलते रहे पैसे, इलाज रखा जारी
सुनवाई में ये बात सामने आई है कि प्रशांत का परिवार उसे वेंटिलेटर पर रखना नहीं चाहता था, इस बारे में उसके परिवार से कोई लिखित सहमति भी नहीं ली गई थी। परिवार ने बताया कि जब तक हॉस्पिटल को पैसे मिलते रहे उसने प्रशांत को वेंटिलेटर पर रखा। हॉस्पिटल का कहना है कि प्रशांत के परिवार ने शुरुआत में उसे वेंटिलेटर पर रखने के लिए सहमति नहीं दी थी, लेकिन जब एक वरिष्ठ कंसल्टेंट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया तो वे सहमत हो गए थे।

डायबिटीज नहीं थी, फिर इंसुलिन का दिया गया भारी डोज
इस मामले को लेकर प्रशांत के माता पिता शशिकांत शर्मा और शकुंतला देवी ने कहा कि अप्रैल 2006 में प्रशांत को वेंटिलेटर पर रखा गया था, इन्होंने आरोप लगाया कि ट्यूब को गलत तरीके से जोड़ा गया था और उसे किसी सीनियर डॉक्टर ने देखा नहीं, प्रशांत को इंसूलिन का भारी डोज दिया गया, जबकि उसे डायबिटीज नहीं थी।

28 मई को लड़के ने तोड़ा दम
प्रशांत के माता पिता ने कहते हैं कि जबतक प्रशांत के परिवार वालों ने पैसा देना जारी रखा तबतक उसे वेंटिलेटर पर रखा गया, जैसे ही उनके पास फंड की कमी हुई उसे वेंटिलेटर से हटा दिया गया। प्रशांत उस तरह से पड़ा रहा , आखिरकार 28 मई 2008 को उसे मृत घोषित कर दिया गया। वहीं इन आरोपों पर अस्पताल का कहना है कि पहले तो प्रशांत के माता-पिता ने उसे वेंटिलेटर पर रखने की अनुमित नहीं दी, लेकिन एक बार सीनियर डॉक्टर द्वारा समझाने के बाद वे राजी हो गये।

इस केस के बारे में राममनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टर्स ने एक्सपर्ट का ओपिनियन देते हुए कहा है कि इस घटना को लेकर अस्पताल खुद को कैसे जस्टिफाई कर पाएगा। ये बड़ी सामान्य सी बात है कि ब्रेन डेड होने के बाद बॉडी में किसी तरह का कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिलता।