
Acharyashree Vidyasagar Maharaj
दमोह. आचार्यश्री विद्यासागर महराज का शरद पूर्णिमा को जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। आचार्यश्री ऐसी मूरत हैं, जिन्हें देख सभी नतमस्तक हो जाते हैं। सौम्य, स्वरूप नीचे सिर और आशीर्वाद की मुद्रा हर भक्त को गुरु के व्यक्तित्व की ओर आकर्षित करती है। आचार्यश्री का कुंडलपुर में भगवान आदिनाथ जिन्हें बड़े बाबा के नाम से जाना जाता है, इनके प्रति गहरा लगाव रहा है। जिनके छोटे से मंदिर को देश के सबसे उच्च शिखर वाले मंदिरों में शुमार होने की प्रेरणा दी। जिससे दमोह के लोगा आचार्यश्री की पुकार छोटे बाबा के रूप में लगाने लगे हैं।
आचार्य विद्यासागर महाराज का जन्म 10 अक्टूबर 1946 शरद पूर्णिमा को कर्नाटक के बेलगांव जिले के सद्लगा गांव में हुआ था। उनके पिता मल्लप्पाजी अष्टगे व माता श्रीमंतीअष्टगे ने उनका नाम विद्याधर रखा। विद्याधर में बचपन से ही धर्म के प्रति लगाव था। वह घर पर अपने भाईयों और मित्रों के साथ बचापन में धार्मिक खेलों का मंचन करते थे। कन्नड़ भाषा में हाइस्कूल तक अध्ययन करने के बाद विद्याधर ने 1967 में आचार्य देश भूषण महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था। कठिन साधना का मार्ग पार करते हुए 22 साल की उम्र 30 जून 1968 को अजमेर में आचार्य ज्ञान सागर महाराज से मुनि दीक्षा ली। 22 नवंबर 1972 को अजमेर में ही आचार्य की उपाधि देकर मुनि विद्यासागर से आचार्य विद्यासागर बना दिया। जिसके बाद देश भ्रमण पर निकल गए।
कुंडलपुर में किए 5 चार्तुमास
आचार्यश्री विद्यासागर महाराज 1976 में पहली बार कुंडलपुर पहुंचे थे। इसके बाद 1977 में आए। फिर 2 से 3 साल के अंतराल में कुंडलपुर का चक्कर लगता रहा है। साल 2000 में कुंडलपुर के नए मंदिर की आधार शिला रखी। 2001 में महामस्तिकाभिषेक का आयोजन किया। इसके बाद 2016 में महामस्तिकाभिषेक का आयोजन किया गया। आचार्यश्री ने कुंडलपुर में 5 चार्तुमास व 15 वाचनाएं की हैं।
कुंडलपुर से है विशेष लगाव
आचार्यश्री का कुंडलपुर से लगाव है। 2016 से वे स्वयं तो नहीं आ पाए हैं, लेकिन जबकि इनके दीक्षित आचार्य, मुनि, आर्यिका कुंडलपुर में प्रवास करते रहते हैं। वर्तमान में आचार्यश्री से दीक्षित आर्यिका ऋजुमति माता, पूर्णमति माता व उपशांतमति माता कुंडलपुर में विराजमान हैं। जबकि उनसे दीक्षित आचार्य निर्भय सागर दमोह में विराजमान हैं। इससे पहले कुंडलपुर में विराजमान थे, जिसमें कुंडलपुर के इतिहास में पहली मुनिदीक्षा भी हुई थी। आचार्यश्री द्वारा दीक्षित लगभग 21 आचार्य, 130 मुनिराजों, 172 आर्यिकाओं व 20 ऐलक, 14 क्षुल्लकगणों के साथ आर्यिकाओं को दीक्षित किया है। जिनके अलग-अलग संघ देश भर में भ्रमण कर रहे हैं। जिससे आचार्यश्री का सबसे बड़ा संघ माना जाता है।
आचार्यश्री की रचनाओं पर हुए शोध
आचार्यश्री विद्यासागर महाराज संस्कृत, प्राकृत भाषा के साथ हिंदी, मराठी और कन्नड़ भाषा का भी विशेष ज्ञान रखते हैं। उन्होंने हिंदी और संस्कृत में कई रचनाएं भी लिखी हैं। उनके सारे महाकाव्यों में अनेक सूक्तियां भरी पड़ी है। जिनमें आधुनिक समस्याओं की व्याख्या तथा समाधान भी है। सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त कुरीतियों का निदर्शन भी है। पीएचडी व मास्टर डिग्री के कई शोधर्थियों ने उनकी रचनाएं निरंजना शतक, भावना शत, परीशह जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक पर अध्ययन व शोध किया है।
सूती वस्त्र निर्माण से आत्मनिर्भरता
आर्चाश्री विद्यासागर महाराज की प्रेरणा से कुंडलपुर में 189 फुट ऊंचाई के शिखर वाला देश का सबसे ऊंचा मंदिर बन रहा है, वहीं आत्मनिर्भरता के लिए सूती वस्त्र निर्माण के साथ गौ-शाला से घी, गौ-मूत्र से अनेक औषधियों का निर्माण भी किया जा रहा है, जिससे आचार्यश्री के आत्म निर्भर अभियान से कई युवा लाखों का पैकेज को छोड़कर आचार्यश्री के आत्मनिर्भर अभियान में अपना योगदान देने में जुट गए हैं।
दमोह के लोग पुकारते हैं छोटे बाबा
आचार्यश्री विद्यासागर महाराज दमोह के लोगों से बड़ा मोह रखते हैं, यहां के भक्तों की आचार्यश्री के प्रति आगाध श्रद्धा के चलते आचार्यश्री ने भी अपने प्रवचनों में दमोह वासियों के विशेष मोह का जिक्र किया है। जिससे दमोह के लोग भी आचार्यश्री के छोटे बाबा के नाम से जयकारे लगाने हैं।
Published on:
31 Oct 2020 04:04 am
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