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खतरनाक स्कूल, जहां मौत का मुंह देखे बिना बच्चों का पहुंचना मुश्किल

खतरनाक स्कूल, जहां मौत का मुंह देखे बिना बच्चों का पहुंचना मुश्किल,10 मिनिट के रास्ते में दो से तीन बार देखते है मौत का मुंह, भगवान का नाम लेकर करते हैं रास्ता पार, दमोह जिले के असलाना स्कूल तक पहुंचना बच्चों के लिए हैं मुश्किल, अभिभावक भी जानते हैं खतरा, लेकिन स्कूल भेजना मजबूरी, खतरनाक स्कूल

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दमोह

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Samved Jain

Jul 12, 2023

खतरनाक स्कूल, जहां मौत का मुंह देखे बिना बच्चों का पहुंचना मुश्किल

खतरनाक स्कूल, जहां मौत का मुंह देखे बिना बच्चों का पहुंचना मुश्किल

जर्जर स्कूल, स्कूल में सांप, स्कूल में भूत ऐसी कहानियां तो बहुत आपके सामने आई होगी, लेकिन ऐसा खतरनाक स्कूल आपने कभी नहीं देखा होगा। जहां पहुंचने के लिए बच्चों को मौत के मुंह को देखना ही पड़ता हैं। इस खतरनाक स्कूल तक पहुंचने के लिए 10 मिनट का कोई भरोसा नहीं रहता कि कब कौन मौत की नींद सो जाए, लेकिन इस रास्ते के तय करने के बाद खतरनाक स्कूल अपने आप सामान्य हो जाता हैं। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि कुछ इस के हालात मध्यप्रदेश के दमोह जिले के एक स्कूल में हकीकत में देखने मिलते हैं। ऐसे में इस स्कूल को दमोह का खतरनाक स्कूल भी माना जाने लगा हैं।

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दमोह जिले के असलाना सरकारी स्कूल में पढऩे वाले बच्चों की जिंदगी से सरकार द्वारा इस खतरनाका स्कूल में पढ़ाकर खेल खेला जा रहा हैं। असलाना गांव में संचालित शासकीय हाइस्कूल में पढऩे वाले बच्चे दिन में एक बार नहीं बल्कि दो बार अपनी जान दाव पर लगाते हैं। दरअसल स्कूल तक आने और स्कूल से वापस घर जाने के लिए मासूम बच्चों को जिले की सबसे बड़ी नदी सुनार को पार करना होता है। एक टूटी फूटी नाव के सहारे स्कूली बच्चे नदी को हर रोज पार करते हैं। बारिश के इन दिनों में नदी उफान पर चल रही है, ऐसे में बच्चों को एक स्थानीय वृद्ध मछुवारा नदी को पार करा रहा है।

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- डर तो लगता हैं, लेकिन क्या करें...
कक्षा आठवीं की छात्रा रक्षा कुर्मी ने बताया कि नदी को जर्जर नाव के सहारे पार करते हैं। इस दौरान बहुत डर लगता हैए लेकिन स्कूल आना हमारी मजबूरी है। बीच नदी में जब नाव होती है, तो डर लगता है कि नाव पलट गईए तो हमारा क्या होगा। इसी तरह कक्षा आठवीं की छात्रा आयुषी ने बताया कि हम लोग प्रतिदिन अपनी जान पर खेलकर स्कूल आते हैं और वापस घर जाते हैं। कभी कभीए तो नदी बहुत उफान पर होती है। कभी ऐसा होता है कि जब स्कूल से वापस घर जाते हैंए तो नदी का जल स्तर बढ़ जाता है। ऐसे में हम लोग नदी को पार करते हैं। यह हमारी मजबूरी है। कक्षा बारहवीं की छात्रा ने कहा कि नदी पार करने के दौरान नाव पलट जाएए तो उन छात्राओं का बच पाना संभव नहीं हैए जो तैरकर नहीं जानतीं हैं। एक वृद्धए जो नाव चलाता है वह ऐसे में कितने बच्चों को बचा पाएगा, इसका अंदाजा स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है।

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- 7 साल से बनी स्थिति, एक प्रयास फेल
नदी पार करने के लिए स्थानीय लोगों के प्रयासों की बदौलत शासन द्वारा करोड़ों रुपए की राशि खर्च कर पुल का निर्माण करा दिया गया, लेकिन सात साल पहले बनकर तैयार हुआ पुल आज तक शुरू नहीं हो पाया है। ऐसा इसीलिए क्योंकि पुल के दोनों ओर सड़क नहीं है। पुल निर्माण के दौरान मौका स्थिति के चयन में लापरवाही बरती गई थी। क्योंकि पुल के दोनों ओर निजी जमीनें हैं, जिसकी वजह से सड़क का निर्माण नहीं हो सका। लिहाजा पुल बनने के बाद भी स्थिति यहां की वही है, जो पुल निर्माण होने से पहले की थी।

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- पढ़ाई के लिए उठाना पड़ रहा खतरा
स्कूल के प्राचार्य हरगोविंद तिवारी ने बताया कि प्रमुखत: बड़ी सागौनी के बच्चे नदी पार कर असलाना गांव के स्कूल आते हैं। उन्होंने कहा कि आने जाने में बच्चों की जान दाव पर होती है, लेकिन क्या करें। बच्चों को पढ़ाई के लिए यह खतरा उठाना पड़ रहा है। शासन ही इन बच्चों की परेशानी को दूर कर सकता है। स्कूल में पढऩे वाले ऐसे बच्चों की संख्या काफी है, जो नदी को पार कर स्कूल पहुंचते हैं। बता दें कि जो वृद्ध मछुवारा नदी को पार करा रहा है वह अपनी जर्जर नाव चलाने के लिए किसी पतवार का उपयोग नहीं करता, बल्कि रस्सी के सहारे नदी को पार करता है। नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक काफी लंबी रस्सी गांव वालों ने बांध रखी है। इस रस्सी को पकड़कर ही वृद्ध नाव को आगे बढ़ाता है। इस संबंध में दमोह कलेक्टर मयंक अग्रवाल का कहना है कि यह मामला काफी गंभीर है। पता करवाता हूं कि पुल शुरू होने में क्या अड़चने हैं। निश्चित स्थिति में सुधार लाने प्रयास किया जाएगा।