
Distribute, liquor, sari notes, never give them votes
दमोह. अक्सर चुनाव के दौरान धनबली प्रत्याशियों द्वारा शराब, रुपया, साडिय़ां, ढोलक, खेल सामग्री बांटी जाने की चर्चाएं जोरों पर होती हैं। यदा-कदा ऐसे मामले भी पकड़े गए हैं। जिससे इस बार चुनाव आयोग भी ऐसे नारों का सहारा ले रहा है, जिनकी दम पर प्रत्याशी चुनाव की वैतरणी पार कर जाते थे।
इस बार चुनाव आयोग निष्पक्ष व बगैर प्रलोभन के चुनाव कराने के लिए कमर कसे हुए हैं। जहां मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर जोर दे रहा है, वहीं राजनीतिक नारों के शोर गुल और हुंकार के बीच अपने नारे भी जनता की कानों तक गुंजायमान कर रहा है।
ये नारे लुभा रहे हैं।
लालच देकर वोट जो मांगे, भ्रष्टाचार करेगा आगे।बांटे, दारू, साड़ी नोट। उनको कभी न देंगे वोट। जाति पे न धर्म पे, बटन दबेगा कर्म पे। एक वोट से होती हार। वो न हो कोई बेकार। आपके हाथ में है ताकत। सही शख्स को दें अपना मत। बहकावे में कभी न आना। सोच-समझकर बटन दबाना। नशे से न नोट से, किस्मत बदलेगी वोट से। बूढ़े हो या आप जवान। सभी करें मतदान। वोट करें वफादारी से। चयन करें समझदारी से। वोट की कीमत कभी न लेंगे। लेकिन वोट जरुर देंगे। मत देना अपना अधिकार। बदले में न लें उपहार। आओ करें मतदान की चोट और मिटाएं लोकतंत्र की खोट।
बच्चों ने रट लिए हैं नारे
चुनाव आयोग ने इस बार जागरुकता अभियान के दौरान बच्चों की रैलियां निकाली हैं, जिनमें करीब २०० से अधिक नारों का प्रयोग किया गया है। जिससे गली बस्तियों में शाम के समय बच्चे नारों को लेकर खेल खेल रहे हैं। जिनमें वे ही नारे लगाते हैं जिनका प्रलोभन प्रत्याशियों द्वारा बच्चों के अभिभावकों को दिया जाता है। बच्चों के मुख से निकल रहे नारों से भी लोग प्रभावित हो रहे हैं।
असर कर रहे हैं नारे
हरिश्चंद्र अहिरवार का कहना है कि चुनाव आते हैं तो दलित बस्तियों के अलावा गरीब बस्तियों में प्रत्याशियों के समर्थकों द्वारा लोभ लालच दिया जाता है। चुनाव आने से पहले मैदानों में खेल रहे बच्चों को खेल सामग्री, भजन मंडिलयों को ढोलक, मजीरे, नशेडिय़ों को शराब की बोतलें, बुजुर्गों के लिए कंबल, महिलाओं को साडिय़ां व पायल बांटी जाती हैं। लेकिन इस बार चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए जागरुकता अभियान का असर दिख रहा है। ऐसे प्रलोभनों से लोग अब धीरे-धीरे दूर होकर अपने आसपास के विकास व अन्य सुविधाओं की बात करने लगे हैं।
लोभ लालच ने पूंजीपतियों तक सीमित किया चुनाव
समाजसेवी पं. दिवाकर करमरकर विजय का कहना है कि भले ही चुनाव आयोग द्वारा खर्च की अधिकत्तम सीमा 28 लाख की हो, लेकिन प्रत्याशी 10 करोड़ रुपए तक चोरी छिपे खर्चें करते चले आ रहे हैं। जिससे चुनाव पूंजीपतियों तक सिमट कर रह गया है। चुनाव आयोग की मंशा हमेशा निष्पक्ष चुनाव कराने की रही है। राजनीतिक दल नारों से चुनाव जीतते रहे हैं, इस बार चुनाव आयोग अधिक मतदान कराने व प्रलोभनों से दूर रहने के नारों से निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव कराने के लिए अथक परिश्रम कर रहा है।
वर्जन
पिछले दो चुनावों से चुनाव आयोग ने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने व लोभ लालच के बगैर मतदान कराने के लिए प्रचार-प्रसार में नारों का इस्तेमाल किया है। इस बार चुनाव आयोग ने करीब 200 नारों का इस्तेमाल किया है, जो आसानी से लोगों के जहन पर चढ़ रहे हैं। जिससे इस बार उम्मीद है कि मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा और लोग लोभ, लालच और भय मुक्त होकर आगे आकर मतदान करेंगे।
डॉ. आलोक सोनवलकर, नोडल अधिकारी प्रशिक्षण
Published on:
16 Oct 2018 11:26 am
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