
दमोह/ मध्यप्रदेश में आजादी से पूर्व महात्मा गांधी के कई दौरे हुए। उनसे जुड़ी यादें आज भी उन शहरों की आत्माम में बसती है। महात्मा गांधी मध्यप्रदेश के दमोह में भी 2 दिसंबर 1933 को आए थे। इस दौरान यहां एक गुरुद्वारे की नींव भी रखी थी। साथ ही उन्होंने संदेश दिया था कि आपलोगों शराब छोड़ दें, उसके बाद गांव के लोगों ने भी प्रण लिया और उसके बाद शराब छोड़ दी। #Gandhi@150 सीरीज में हम आपको गांधी जी से जुड़ी ऐसी स्टोरी दिखाएंगे। #GandhiMeomries
भले ही महात्मा गांधी आज हमारे बीच में नहीं है, लेकिन दमोह के हरिजन वार्ड में महात्मा गांधी की आत्मा आज भी बसी हुई है। 2 दिसंबर 1933 को महात्मा गांधी जब दमोह पहुंचे तो वह हरिजन बस्ती में गए थे, जहां के लोग अस्वच्छ धंधों में लिप्त थे, शराब की लत से आबादी जकड़ी हुई थी। जिसे इस लत से महात्मा गांधी ने मुक्त कराया तो आज भी इस मोहल्ले का कोई भी युवा शराब, गुटखा व पान तक नहीं खाता है।
गुरु के बताए मार्ग पर चल रहे लोग
इस बस्ती में सभी लोग गुरु नानक देव के बताए मार्ग कर्म करो, जप करो और दान करो के मूल वाक्य को अपनाए हुए हैं। हरि सिंह पारोचे बताते हैं कि जब महात्मा गांधी आए और उन्होंने लोगों को नशा मुक्त करते हुए एक धर्म की राह पर चलने को कहा। उस दौरान हरिजन वार्ड के लोग गुरुनानक देव के सिद्दांतों को मानते थे, जिसके कारण महात्मा गांधी ने स्वयं अपने हाथों से गुरुद्वारा की नींव रखी। जहां पूरे प्रदेश में सबसे बड़े गुरुग्रंथ साहिब मौजूद हैं।
धर्म के मार्ग पर बढ़ परिवर्तन
गुरुद्वारे के ग्रंथी मानते हैं कि जब यहां की समाज ने धर्म के मार्ग पर कदम बढ़ाए तो गुरुद्वारा व सबसे बड़ी गुरुवाणी की मौजूदगी ने सभी को नशा व अस्वच्छता के कामों से पृथक कर दिया और आज के दौर में सभी कर्म की राह पर अपना मुकाम हासिल कर रहे हैं। इस गुरुद्वारा के ग्रंथी हरि सिंह बताते हैं कि उनके बुजुर्गों की विरासत को बाल्मीकि समाज के लोग संभाले हुए हैं और गुरुवाणी पढऩा इस वार्ड के बच्चे भी जानते हैं, जब महात्मा गांधी आए थे तो वे अपनी मां की गर्भ में थे, लेकिन उन्हें आज भी महसूस होता है कि महात्मा गांधी की आत्मा यदि कहीं बसती है तो वह दमोह के इसी गुरुद्वारे में ही बसी हुई है।
बापू के नाम पर वार्ड तक नहीं
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी जिस वार्ड में आए थे, उस वार्ड का नाम महात्मा गांधी के नाम से नहीं है, जबकि वह केवल शासन से इस वार्ड का नाम बापू वार्ड रखने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं।
युवा थे बलेह से साथ आए
वहीं, जिले में एक मात्र जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खेमचंद बजाज बताते हैं कि महात्मा गांधी सागर के अनंतपुरा बलेह होते हुए दमोह पहुंचे थे, जिनका व्यापारियों ने मोरगंज गल्ला मंडी में जोरदार स्वागत किया था। वह भी साथ हो लिए और महात्मा गांधी के आह्वान पर वह भी उनके आंदोलनों की राह पर चल पड़े, उस दौरान मोरगंज गल्ला मंडी में व्यापारियों द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिसमें अपार भीड़ मौजूद थी।
Updated on:
02 Oct 2019 01:55 pm
Published on:
28 Sept 2019 01:51 pm
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