
Water tanker show-piece pipelines not spent in dozens of villages
दमोह. बनवार. फरवरी माह समाप्त हो रहा है, लेकिन जबेरा अंचल जिसकी अधिकांश बसाहट पहाड़ों और जंगलों के बीच हैं, वहां सूखे के हालात अभी से निर्मित होने लगे हैं। अनेक गांवों में नलजल योजना की टंकियां बना दी गई, लेकिन पाइप लाइन न बिछाए जाने से जलसंकट की स्थिति बनी हुई है। वहीं कुछ गांव ऐसे हैं जहां प्राकृतिक जलस्रोतों पर सूखे का असर नहीं पड़ रहा है।
माला मानगढ़ की पेयजल योजना एक दशक बीतने के बाद लाखों की लागत से बनी टंकी शो पीस बनी खड़ी है। वहीं डूमर व रोड के लिए स्वीकृत नलजल योजना पेयजल स्रोत विकसित नहीें होने की वजह से योजनाएं आज भी गांव में पेयजल संकट के समाधान करने कि स्थिति में नहीं हैं। वहीं हरदुआ मानगढ़, सगरा, भजिया, सिंगपुर में मुख्यमंत्री पेयजल नलजल योजना की स्वीकृति का ग्रामीण मुद्दतों से इंतजार कर रहे हंै। बलारपुर, पतलोनी, माला बम्हौरी साहित दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां पेयजल सप्लाई के लिए टंकिया बनकर तैयार खड़ी हैं। लेकिन इन टंकियों में जल भराव की व्यवस्था ग्राम पंचायतों द्वारा की गई, लेकिन पीएचई विभाग द्वारा पाइप लाइन नहीं बिछाई गई है।
गौरतलब है कि उपचुनाव 2011 जीतने के बाद जनता को धन्यवाद देने पहुंचे पीएचई मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने नल जल योजनाएं स्वीकृत की थीं। जिसके चलते पीएचई विभाग ने 40 से 50 लाख की लागत से बम्हौरी माला, रोंड़, हरदुआ सड़क व डूमर साहित पांच नल जल योजना स्वीकृत की थीं, जो केवल कागजों तक सिमटकर रह गई हैं।
इस संबंध में पीएचई उपयंत्री एसडी व्यास का कहना है कि माला में नलजल योजना की टंकी का निर्माण हो चुका है। लाइन ठेकेदार द्वारा डाली जाएगी। वहीं रोंड़ व डूमर में पेयजल स्रोत विकसित के दौरान जलस्तर की कमी बनी हुई है। हरदुआ मानगढ़, सगरा, भजिया व सिंगपुर में मुख्यमंत्री नलजल योजना की स्वीकृति प्रस्तावित है, लेकिन इन ग्रामों में ग्राम पंचायत के द्वारा उपलब्ध संसाधनों के द्वारा पेयजल संकट के चलते पेयजल आपूर्ति की जा रही है।
विरासत में मिली प्राकृति बावली बुझा रही है प्यास
जहां लाखों रुपए की लागत से सरकारी योजनाएं लोगों की प्यास बुझाने में विफल साबित हो रही हैं। वहीं विरासत में मिली प्राकृतिक बावली भीषण सूखे में भी लोगों की प्यास बुझा रही है। इस गंभीर सूखे के दौर में चिलौद, रमपुरा व मुवार झरौली में प्राचीन बाबडिय़ों में पर्याप्त जल है। हालांकि नया बनाने के चक्कर में इन बाबडिय़ों में संरक्षण व संवर्धन न किए जाने से मिट्टी व कचरा जमा हुआ है, इन्हें गहरीकरण की भी आवश्यकता है, लेकिन सूखे के समय यही पानी इन गांवों के लिए वरदान साबित हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि गांवों की प्राचीन बाबडिय़ों का संरक्षण कर उनकी बंद झिरों को खोल दिया जाए तो पूरे गांव को साल भर पानी उपलब्ध हो सकता है, लेकिन इनको नजर अंदाज किया जा रहा है।
Published on:
01 Mar 2018 12:16 pm
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