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फागोत्सव का अद्भुत रूप है बस्तर का फागुन मेला, यहां लकड़ियां नहीं, ताड़ के पत्तों से सजती है माई जी की होलिका

Dantewada Fagun Mela: फागोत्सव के रूप में शक्तिपीठ दंतेश्वरी मन्दिर दंतेवाड़ा का फागुन मेला आयोजित होता है, जो 10 से 13 दिन तक चलता है। इस बार आयोजन की शुरुआत 26 फरवरी से हो रही है। इसमें लोक संस्कृति के विविध रंगों के साथ ही उत्सवधर्मी रचनात्मकता के भी दर्शन होते हैं।

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दंतेवाड़ा का फागुन मेला

दंतेवाड़ा फागुन मेला फ़ाइल फोटो

Dantewada Fagun Mela: फागोत्सव के रूप में शक्तिपीठ दंतेश्वरी मन्दिर दंतेवाड़ा का फागुन मेला आयोजित होता है, जो 10 से 13 दिन तक चलता है। इस बार आयोजन की शुरुआत 26 फरवरी से हो रही है। इसमें लोक संस्कृति के विविध रंगों के साथ ही उत्सवधर्मी रचनात्मकता के भी दर्शन होते हैं। यह मेला फागुन शुक्ल सप्तमी से भरता है। इस दौरान पूरे 9 दिनों तक रोजाना देवी दंतेश्वरी और मावली माता की पालकी मन्दिर से निकलकर नारायण मंदिर तक जाती है। उनके आगे देवी-देवताओं के छत्र और लंबे बांस पर लगी ध्वजा- पताकाएं लेकर ग्रामीण चलते हैं और उनके साथ में फाग गायन करती मंडलियां भी।

ओडिशा से भी पहुंचते हैं देवता
इस आयोजन में बस्तर संभाग के ओडिशा से भी आमंत्रित देवी-देवता पहुंचते हैं। बीते साल 823 देवी-देवताओं का आगमन टेम्पल कमेटी के रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था।

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बुधवार को बड़ा मेला
9वीं पालकी के बाद या उसी दिन बुधवार पड़ने पर बड़ा मेला भरता है। इस दिन देवी दंतेश्वरी के साथ आमंत्रित देवी देवता नगर परिक्रमा करते हैं।

होलिका दहन की विशिष्ट परंपरा
मेले में होलिका दहन व रंग-भंग का आयोजन भी अपने आप में विशिष्टता लिया हुआ है। इस होलिका दहन में लकड़ियां नहीं, बल्कि ताड़ के पत्तों की होलिका सजाई जाती है। इसके दहन के बाद राख से तिलक कर अगली सुबह रंग-भंग की रस्म पूरी करते हैं।

रचते हैं आखेट का स्वांग
प्रधान पुजारी हरेंद्र नाथ जिया के मुताबिक बसंत पंचमी पर मन्दिर के सामने त्रिशूल स्थापना होती है। इसके साथ ही मेले की तैयारियां शुरू होती हैं। मेले की शुरुआत फागुन महीने में करते हैं। मेले के दौरान देर रात आखेट का स्वांग भी रचा जाता है। इन्हें लमहा मार, कोडरी मार, कोडरी मार, चीतर मार, गंवर मार के नाम से जानते हैं। इन्हें देखने ग्रामीण दूर-दराज से यहां पहुंचते हैं।

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