कभी शहर की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले शहर के ऐतिहासिक दरवाजे और खिड़कियां आज शहर की पहचान भी हैं। शहर की चारों तरफ बने फाटक के आसपास के इलाके और बस्तियां आज भी उन्हीं फाटकों के नाम से जाने जाते हैं। हालांकि इनमें से कुछ खिड़की और दरवाजे अपना अस्तित्व खो चुके हैं लेकिन बस्तियों की पहचान आज भी खिड़की और दरवाजों के नाम से ही होती है।
शहर में रियासतकाल में छह दरवाजों और दो खिड़कियों का निर्माण दतिया के तत्कालीन शासक महाराज पारीक्षत ने करवाया था। शहर की चहारदीवारी(रर) के साथ ही इन खिड़की और दरवाजों का निर्माण हुआ था। इतिहासकार रवि ठाकुर के अनुसार चहारदीवारी के साथ खिड़की और दरवाजों के निर्माण की आधार शिला सन १८०५ में रखी गई थी और सन १८२० में इनका निर्माण कार्य पूरा हो गया था।
इस नाम से जाने जाते हैं खिड़की दरवाजे
शहर में चारों ओर बने यह खिड़की दरवाजे शहर के प्रवेश द्वार भी हैं जिनमें भदौरिया की खिड़की, बंगला की खिड़की, कर्नाटक दरवाजा, राजगढ़ दरवाजा, भांडेरी फाटक, सेंवढ़ा दरवाजा (रिछरा फाटक), चूनगर फाटक एवं बड़ौनी दरवाजा है।
१९४३ में नया दरवाजा
राजगढ़ चौराहा के पास सन १९४३ में तत्कालीन नरेश गोविंद सिंह ने नया दरवाजा का निर्माण करवाया था। नया दरवाजे की मरम्मत कराने के साथ इसे बड़ा करवाया गया था जिसे नया दरवाजे के नाम से जाना जाने लगा। इसके अलावा ठंडी सड़क पर भवानी गेट का निर्माण कराया था।
मराठों के आक्रमण रोकने बने थे दरवाजे
चहारदीवारी के साथ ही बने इन दरवाजों का निर्माण मराठाओं के आक्रमण को रोकने के लिए करवाया था। दतिया में दो बार झांसी के मराठाओं और कालपी के मराठाओं ने दतिया पर आक्रमण किया था।