
दौसा. शहर के आगरा रोड पर लगी कंबलों की दुकानें।
दौसा.
जिले में इन दिनों हाड़ कंपा देने वाली सर्दी पड़ रही। सर्दी से राहत पाने के लिए अलाव के अलावा रूई से बने देसी तकनीक वाले रजाई - गद्दे कई बरसों से काम में लेते आ रहे हैं। इसके चलते यह रोजगार यहां पर खूब फला फूला। सर्दी के दिनों में रूई पिनाई के काम से जुड़े लोगों के परिवार दिन-रात मेहनत करके कार्य में जुटे रहते थे। ये हाथ से देशी तकनीक के सहारे रजाई-गद्दे बनाकर लोगों को सर्दी से राहत प्रदान करते हैं, लेकिन समय बदला तो रजाई - गद्दे बनाने की तकनीक भी बदल गई।
आधुनिक मशीनरी युग में अब हाथ की जगह मशीनों ने ले ली। पूर्व में सर्दी के मौसम की शुरूआत होते ही पिनाई का काम करने वालों के यहां पर लोगों की भीड़ जुटने लगती थी लेकिन, बीते एक दशक से हाथों से भरे जाने वाले रजाई-गद्दों के स्थान पर लोगों ने रेडिमेड गर्म कम्बल व डनलप के गद्दे काम लेना शुरू कर दिया है। इससे बड़ी संख्या में पिनाई के काम से जुड़े परिवारों पर रोजी-रोटी का संकट गहराने लगा है। महंगाई के कारण लोग सस्ते विकल्प के तौर पर पानीपत, लुधियाना, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश सहित अन्य कई राज्यों से आ रहे सिंथेटिक कंबल खरीद रहे हैं।
रजाई- गद्दे के कारोबार से जुड़े लोगों ने बताया कि करीब एक दशक पूर्व दीपावली के बाद गुलाबी सर्दी की दस्तक के बाद शहर और गांव के लोग रजाई-गद्दों को भरवाना शुरू कर देते थे। सीजन में हमें फुर्सत ही नहीं मिलती थी। दिन- रात रूई के रजाई- गद्दे भरने व सिलने का काम चलता था। जिले में इस व्यवसाय से जुड़े सैकड़ों परिवारों सहित सिलाई व भराई का काम करने वाले मजूदरों के परिवारों की रोटी का बारह महीने का जुगाड़ हो जाता था।
- बिक्री घटकर रह गई आधी
रजाई- गद्दों के व्यवसाय से जुड़े लोगों के मुताबिक बीते एक दशक में बिक्री घट कर आधी से भी कम रह गई है। पहले जहां एक दुकान पर सीजन में महीने की सौ रजाई व गद्दे बिकते थे। बीते एक दशक में ये बिक्री घट कर आधी रह गई है। हालात ये हो गए हैं कि सीजन के समय कमाई होने की आस में स्टॉक करने के लिए लगाई गई पूंजी पर ब्याज देना पड़ रहा है। दिनभर में मुश्किल से एक-दो रजाई कभी-कभार बिक रही है। इस व्यवसाय में मजदूरी करने वाले लोगों पर भी रोजी रोटी का संकट गहरा गया है।
- रजाई महंगी, कंबल सस्ते
अनीष कंडेरा ने बताया कि रजाई-गद्दे भराई व पिनाई का काम उनकी कई पीढिय़ों से किया जा रहा है। इस कारोबार से जिले में सैकड़ों परिवार परंपरागत रूप से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में रूई से निर्मित एक अच्छी रजाई की कीमत करीब एक हजार से 12 सौ रुपए तक है। रजाई में धागा डालने व रूई पीन कर भरने वाले मजूदरों का परिवार भी इसी कारोबार से चलता है। अब कंबल सस्ती दरों पर मिल रहे हैं। ऐसे में लोगों का रूई की देशी तकनीक वाली रजाइयों से मोहभंग हो रहा है।
- सर्दी से बचा रहा तीन सौ रुपए का कंबल
जिला मुख्यालय पर आगरा रोड पर और राष्ट्रीय राजमार्ग पर विभिन्न जगहों पर सडक के किनारे रंग-बिरंगे कंबलों के ढेर लगे हैं। मध्यप्रदेश, मंदसौर, यूपी, हरियाणा, पंजाब जिले के लोग यहां हर साल कंबल बेचने आते हैं। कारोबार से जुड़े सद्दाम ने बताया कि उनके करीब 10 परिवार पिछले 10 सालों से यहां आकर कंबल बेचने का काम करते हैं। इससे उनके परिवार का गुजारा हो जाता है। पप्पू दायमा ने बताया कि कंबल हरियाणा के पानीपत व पंजाब के लुधियाना शहर से लाकर बेचते हैं। सिंथेटिक कंबल सिंगल बेड के 300 से 800 तक बेचते हैं। वहीं डबल बैड के कंबल 500 से 15 सौ रुपए तक बिकते हैं।
इनका कहना है
सिंथेटक कंबलों की बिक्री ने हमारे परंपरागत कारोबार को खत्म सा कार दिया है। हालात ये हैं कि बीते एक दशक से खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। अब लोगों का देशी तकनीक वाली रूई की रजाई व गद्दों से मोह भंग हो रहा है।
मनीष कुमार, रजाई- गद्दा व्यवसायी, दौसा।
Published on:
07 Jan 2024 03:16 pm
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