
महेश्वराकलां। ग्राम पंचायत जसोता के छोटे से गांव बनेठा ने दौसा जिले का नाम पूरे देश में रोशन कर रखा है। यहां का बुना कपड़ा देशभर में लहराए जा रहे तिरंगे के काम आ रहा है। हालांकि देश में यहां के अलावा कर्नाटक के हुबली एवं महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में भी कुछ बुनकर झण्डा कपड़ा तैयार कर रहे हैं। देश के प्रथम तिरंगा में बनेठा गांव के बुनकरों का बड़ा ही योगदान है।
देश की आजादी के समय 1947 में दिल्ली के लालकिले की प्राचीर पर जो पहला तिरंगा लहराया था, उसका कपड़ा दौसा जिले के आलूदा गांव के चौथमल व नानगराम महावर ने बुना था। जानकारों की माने तो वह यह झण्डा दिल्ली में सुरक्षित रखा है। अब देश में गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर जो तिरंगा लहराया जाता है, वह यहां बुना कपड़ा की काम में लिया जाता है।
बनेठा गांव में प्रवेश करने पर छोटे-छोटे मकान व उनमें लगे हथकरघे नजर आएंगे। वर्षों से यहां के कारीगर देश के लिए तिरंगे का कपड़ा (झण्डा क्लोथ) बुन रहे हैं। बुनकरों ने बताया कि उनको गर्व है कि वे उनका बुना कपड़ा देश के तिरंगे के काम का आ रहा है।
गौरतलब है कि दौसा खादी समिति के अधीन थूमड़ी, छारेड़ा, कालीखाड़, रजवास, नांगल राजावतान, दौसा व आलूदा में भी बुनकर है, लेकिन यहां झण्डा क्लोथ सिर्फ बनेठा में ही बुना जाता है। बनेठा में जो कारीगर झण्डा क्लोथ तैयार कर रहे हैं, उनको भी हथ करघा हाथ से ही चलाना पड़ रहा है। जबकि इस आधुनिकता में उनके लिए कपड़ा बुनने के लिए नई मशीनें या करघे आने चाहिए। साथ ही काम को बेहतर करने के लिए प्रशिक्षण भी देने की जरूरत है।
कारीगर प्रभुदयाल महावर ने बताया कि उनके परिवार में कई वर्षों से इस कपड़े को बुना जा रहा है। उन्हें गर्व है, कि उनका बुना कपड़ा देश की शान है। उन्होंने बताया कि साढ़े 15 मीटर लबे कपड़े का थान बुनने में उनको करीब ढाई सौ रुपए मिल पाते हैं।
कारीगर छोटे लाल महावर ने बताया कि पहले आलूदा में भी तिरंगे का कपड़ा बुना जाता था। उनको दौसा खादी भण्डार से कच्चा सूत मिलता है। वे यहां पर पानी में गेहूं का आटा मिलाकर उसमें इस सूत को मिलाकर सुखाते हैं। इससे कपड़े में निखार आता है।
Published on:
15 Aug 2024 01:38 pm
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