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जानिए स्वच्छता की कहानी, बुजुर्गों की जुबानी-निजी व्यस्तता ने बिगाड़ा कचरा प्रबंधन

आजादी से पहले एवं उसके बाद तक सफाई रोजमर्रा के कार्यों में रची बसी थी।

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दौसा. बढ़ती आबादी एवं लचर प्रबंधन के कारण सरकार को स्वच्छता को एक अभियान के रूप में चलाना पड़ रहा हो, लेकिन आजादी से पहले एवं उसके बाद तक सफाई रोजमर्रा के कार्यों में रची बसी थी। घरों से निकलने वाले कचरे की छंटनी कर अन्य कार्यों में पुर्नउपयोग में लिया जाता था। ऐसे में कचरा प्रबंधन एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी, लेकिन वर्तमान में लोगों की व्यस्तता के चलते सफाई के मामले में सरकारी संसाधन या दूसरे लोगों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।


2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत के तीन वर्ष पूरे हो जाने के बाद पत्रिका ने आजादी के पहले का वातावरण देख चुके वृद्धजनों से बात की तो सामने आया कि बढ़ती जनसंख्या के कारण भी सरकारी योजनाएं जरुरत के हिसाब से नाकाफी साबित हो रही है। सफाई के मामले में पहले परिवार के सदस्य हाथ बंटाते थे।

जैविक खाद बन सकने वाले घर से निकलने वाले कचरे की अलग से छंटनी की जाती थी। इसका उपयोग कृषि कार्य के लिए होता था। शेष का उपयोग सब्जी आदि को भी पशुओं के खिलाने में लिया जाता था।

पॉलीथिन का उपयोग भी सीमित मात्रा में ही होता था। ऐसे में कहा जा सकता है कि कुछ हद तक कचरे का उचित प्रबंधन होता था, लेकिन वर्तमान में पॉलीथिन का अधिक उपयोग, कचरे को इधर-उधर फेंकने की मानसिकता एवं जैविक खाद का न्यूनतम उपयोग के कारण कचरे का प्रबंधन करना किसी चुनौती से कम नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में कचरे की केटेगिरी के हिसाब से उसके निस्तारण की व्यवस्था करने की जरुरत है।

पांच दिवसीय दीपोत्सव त्यौहार में कुछ दिन शेष रहे हैं। ऐसे में सभी घरों व प्रतिष्ठानों में साफ-सफाई का कार्य जोरों से चल रहा है। लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वे भी अपने घरों व प्रतिष्ठानों के बाहर तथा मार्गों पर कचरा व गंदगी नहीं फैलाएं।

सत्याग्रह एवं अन्य आन्दोलनों में कई बार जेल जा चुके 84 वर्षीय गोवर्धनलाल बढ़ेरा ने बताया कि दौसा शहर में आजादी के बाद से ही सफाई की व्यवस्था लागू रही है। हाथ ठेलों के माध्यम से कचरे का उठाव होता था, लेकिन उस दौर में अधिकांश वस्तुओं को पूरी तरह से काम में लेने की आदत थी। ऐसे में कचरा भी कम होता था।


सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक राधेश्याम शर्मा ने कहा कि पहले कचरे का प्रबंधन इस प्रकार होता था कि अधिकांश वस्तुओं के दोबारा कार्य में ले लिया जाता था। घरों से निकलने वाले कचरे को छांटकर पशुओं के लिए बनने वाली खाद्य सामग्री एवं जैविक खाद बनाने के उपयोग में लेते थे। सफाईकर्मी भी क्षेत्रवार आने से सफाई की समस्या भी नहीं रहती थी।

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