
मानपुर कस्बे में बनी कचहरी।
दौसा. मानपुर कस्बा कभी राजाओं का गढ़ हुआ करता था, लेकिन वर्तमान में देखरेख के अभाव में यहां बने किले व कचहरी व मंदिर खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। मानपुर कस्बा बाणगंगा नदी के किनारे व राष्ट्रीय राजमार्ग-21 के समीप बसा है। जिसकी इतिहास में अलग ही एक पहचान बनकर रह गई है। वर्ष 1661 में आमेर के राजा मान प्रथम के सम्मान में मानपुर कस्बा बसाया गया था. जिसके बाद से ही मानपुर के नाम से कस्बे की पहचान हुई है। भरतपुर की ओर से होने वाले आक्रमणकारी को रोकने में मानपुर किलेदार की अहम भूमिका होती थी।
करीब 500 वर्ष पहले जयपुर रियासत व लोटवाड़ा के जागीरदार के बीच युद्ध होने के बाद मानपुर कचहरी को खालसा कर दिया गया. उसके बाद लोटवाड़ा के जागीरदार मानपुर की जागीर को छोड़कर लोटवाड़ा जा बसे। मानपुर कस्बे में एक दर्जन से अधिक मंदिर हैं। जिसमें दाऊजी मंंदिर, बिहारीजी का मंंदिर सहित अन्य मंदिर सैकड़ों वर्षों पुराने बने हैंं। आज भी ये मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र बने हुए हैं। कस्बे के बीचो बीच कचहरी हुआ करती थी जहां पर तालुका में तहसीलदार बैठा करते थे. कस्बे की सुरक्षा के लिए चारों और कच्ची चारदीवार बनी हुई थी। चार कोनों पर कुएं बने हुए है। जहां पर महिलाएं स्नान करती थी। कस्बे में तीन दरवाजे थे। जिसमें एक बहना दरवाजा, पांचोली दरवाजा, पई दरवाजा। कस्बे में प्रसिद्ध लोहार हुआ करते थे जो तलवार, बंदूक बनाने में अपने पहचान बनाए हुए थे। यहां के कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी छाप छोड़ी है. जिसमें एक नारायण सैहना व नारायण राजोरिया हैं। दाऊजी मंदिर के पुजारी ईश्वरदास ने बताया कि मानपुर कस्बा पहले के जमाने में व्यापार का गढ़ था, यहां पर मंडी व चुंगी चौकी हुआ करती थी। गणगौर व तीज की राज शाही सवारी निकलत थी।
कस्बे में राज्य स्तरीय पशु मेला भरता था. जिसमें राजस्थान सहित हरियाणा, यूपी, गुजरात सहित अन्य राज्यों से पशु आते थे। मानपुर के सबसे पहले सरपंच नाथूलाल सामरिया व प्रधान गुलजारीलाल बोहरा बने थे। वर्ष 1965 के बाद मानपुर कस्बा राजनीतिक की भेंट चढ गया। गंदी राजनीति के चलते यहां पर संचालित तहसील को सिकराय में स्थानांतरित कर दिया गया। तहसील जाने के बाद सभी कार्यालय एक के बाद एक सिकराय खुल गए। सिकराय ब्लॉक में सबसे अधिक छात्राएं यहां के राजकीय विद्यालय में अध्ययनरत है. उसके बाद भी कन्या महाविद्यालय नहीं खुलने से छात्राएं उच्च शिक्षा से वंचित है। मानपुर कस्बा की आबादी पांच हजार से अधिक है। उसके बाद भी विकास के नाम यहां पर कुछ नहीं है।
करणी सेना के अध्यक्ष गिर्राजसिंह लोटवाड़ा ने बताया कि मानपुर कस्बे की उस समय एक अलग ही पहचान थी. लेकिन अब यहां की गंदी राजनीतिक चलते मानपुर कस्बा में अब कुछ नहीं है। कस्बेे की पहचान के लिए पूर्वजों ने आमेर के राजाओं से युद्ध किया। युद्ध के बाद कचहरी को खालसा कर दिया। खालसा करने के बाद पूर्वज मानपुर की रियासत को छोड़कर लोटवाड़ा बस गए। मानपुर में उस समय प्रसिद्ध मंडी व बाजार हुआ करता था. आज भी पूर्वजों के किला, कचहरी व बुर्जा सहित अन्य रियासतें मानपुर में बनी हुई है, जो देखरेख के चलते खंडहर में तब्दील हो गई हैं।
कांग्रेस नेता घनश्याम तिवारी ने बताया कि मानपुर कस्बा आज विकास के नाम पर बहुत पीछे रह गया है। जहां पर एक और राष्ट्रीय राजमार्ग निकल रहा है तो दूसरी ओर पवित्र नदी बाणगंगा निकल रही है। कस्बे में आज भी विकास की दरकार है।
Published on:
03 Apr 2021 12:19 pm
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