23 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘हिंदू-मुस्लिम’ के अपने-अपने दावे, भोजशाला आज भी जारी है पूजा-नमाज का सिलसिला

Dhar Bhojshala Controversy: भोजशाला परिसर में वसंत पंचमी उत्सव मनाने की शुरुआत वर्ष 1952 में हुई। धीरे-धीरे यह धार्मिक आयोजन सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ता गया...

2 min read
Google source verification

धार

image

Astha Awasthi

Jan 20, 2026

Dhar Bhojshala Controversy

Dhar Bhojshala Controversy (Photo Source - Patrika)

Dhar Bhojshala Controversy: धार शहर के मध्य स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा संरक्षित ऐतिहासिक धरोहर भोजशाला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। दिन 23 जनवरी को वसंत पंचमी उत्सव और सरस्वती यज्ञ प्रस्तावित हैं। तिथि शुक्रवार होने के कारण प्रशासन कानून व्यवस्था को लेकर सतर्क है और शहर पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है।

मौजूदा हालात ने भोजशाला से जुड़े उस लंबे संघर्ष को एक बार फिर स्मृति केझरोखों में जीवंत कर दिया है, जो आस्था, इतिहास और अधिकार के सवालों के साथ पिछले सात दशकों से चलता आ रहा है। करीब 74 वर्षों से भोजशाला में मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा पुनः स्थापित करने के संकल्प को लेकर हिंदू समाज आंदोलनरत है। यह स्वतंत्र भारत में अयोध्या राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद सबसे लंबे और प्रभावशाली आंदोलनों में गिना जाता है।

1952 से पड़ी आंदोलन की नींव

भोजशाला परिसर में वसंत पंचमी उत्सव मनाने की शुरुआत वर्ष 1952 में हुई। धीरे-धीरे यह धार्मिक आयोजन सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ता गया। 1994 से 2003 के बीच भोजशाला को लेकर कई बड़े प्रदर्शन हुए। इस दौरान प्रशासनिक दबाव और दमन के बावजूद आंदोलनकारी अपने संकल्प पर डटे रहे। आंदोलन अपने चरम पर तब पहुंचा जब 2003 में भोजशाला के ताले खोले गए और हिंदू समाज को प्रत्येक मंगलवार पूजा का अधिकार मिला। उसी कड़ी में वसंत पंचमी पर अखंड पूजा का संकल्प सामने आया।

इतिहास और पृष्ठभूमि

इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का निर्माण 1034 ईस्वी में परमार शासक महाराजा भोज ने कराया था। इसे अध्ययनशाला के रूप में स्थापित किया गया, जहां भाषा, विद्या और संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता था। भोजशाला को मां वाग्देवी के प्राकट्य स्थल के रूप में भी जाना जाता है। महाराजा भोज ने 84 ग्रंथों न की रचना की थी। इतिहास के अलग-ने अलग कालखंडों में 1305 से 1514 के बीच अलाउद्दीन खिलजी, दिलावर खां गौरी और महमूद खिलजी द्वितीय के आक्रमणों से इस इमारत को क्षति पहुंची।

ब्रिटिश काल और प्रतिमा का लंदन जाना

ब्रिटिश शासन के दौरान भोजशाला का सर्वे कराया गया। यहां से मां वाग्देवी की प्रतिमा मिलने का उल्लेख मिलता है, जिसे अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड लंदन ले गए। यह प्रतिमा आज भी वहां के संग्रहालय में होने की बात कही जाती है। वर्ष 1904 में अंग्रेज सरकार ने भोजशाला को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया।

यहीं से बढ़ा टकराव

इतिहास में भोजशाला का महत्व निर्विवाद है, लेकिन इसके स्वरूप और अधिकार को लेकर हिंदू और मुस्लिम समाज के अपने-अपने दावे है। मुस्लिम समाज इसे कमाल मौलाना मस्जिद मानते हुए नमाज अदा करता रहा है, वहीं हिंदू समाज वसंत पंचमी पर पूजा करता आया है। वर्ष 1998 में वसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ आने पर विवाद गहराया। इसके पहले 12 मई 1997 को तत्कालीन कलेक्टर वीबी सुब्रह्मण्यम ने भोजशाला पर ताले लगवा दिए थे। ताले खुलवाने की मांग ने जनआंदोलन का रूप दे दिया।

2003 का आदेश और आज की स्थिति

2003 में ताले खोले गए और 7 अप्रेल को एएसआइ ने आदेश जारी किया। इसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति दी गई। आदेश में वसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा का अधिकार भी दिया गया, लेकिन यदि वसंत पंचमी शुक्रवार को पड़े तो स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। इसी अस्पष्टता के कारण जब-जब वसंत पंचमी शुक्रवार को आई, तब पूजा और नमाज को लेकर प्रशासन, हिंदू संगठनों और मुस्लिम समाज के बीच तनाव की स्थिति बनी।