
chanakya niti in hindi
भारतीय कूटनीतिज्ञ चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रंथ में महिला-पुरूष तथा समाज से जुड़ी ऐसी कई बातों का जिक्र किया है, जिन्हें अपना कर किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है
अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विज:।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपु:।।
अर्थ: जिस देश में लोग भूखमरी का सामना कर रहे हो वहां हवन करने में घी तथा अन्न को जलाना राष्ट्रद्रोह के समान है। ऎसे हवन को करने वाले ब्राह्मण तथा आयोजक दोनों ही मंत्रों की शुद्ध भावना और पूजा के शुद्ध उद्देश्य को अपवित्र करते हैं। अर्थात उन्हें सबसे पहले भूखों को खाना खिलाकर दरिद्रनारायण रूप भगवान को तृप्त करना चाहिए।
एक एवं पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षित:।
कुणप: कामिनी मांसं योगिभि: कामिभि: श्वभि:।।
अर्थ: किसी भी चीज को देखने के कई नजरिए होते हैं। हर आदमी दूसरे को स्वयं के नजरिए से देखना पसंद करता है। उदाहरण के लिए एक सुंदर स्त्री। एक सच्चे योगी, साधु के लिए वह एक मुर्दे के समान है जिसका कोई उपयोग नहीं है। एक कामी पुरूष के लिए वह इच्छापूर्ति का साधन है जिससे वह अपनी काम पीड़ा तथा वासना को तृप्त कर सकता है। परन्तु एक कुत्ते (या हिंसक जीव) के लिए वह न तो मुर्दा और न ही इच्छापूर्ति का साधन, बल्कि मांस के टुकड़ों के रूप में उसका भोजन है।
नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपा:।।
अर्थ: आदमी को कभी भी सीधा और सरल नहीं होना चाहिए। जंगल में जो पेड़ सीधे, चिकने होते हैं और जिन्हें काटने में कठिनाई नहीं होती, उन्हें ही सबसे पहले काटा जाता है।
स्त्रीणां दि्वगुण आहारो बुदि्धस्तासां चतुर्गुणा।
साहसं षड्गुणं चैव कामोऽष्टगुण उच्यते।।
अर्थ: एक स्त्री पुरूष की अपेक्षा दुगुना आहार लेती है, चार गुणा बुदि्धमान और चालाक होती है, छह गुणा साहसी होती है और उसमें कामेच्छा (सेक्स करने की इच्छा) पुरूष से आठ गुणा होती है। यही कारण है कि स्त्री पुरूष को सदैव परास्त कर देती है।
यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बान्धवा:।
यस्याऽर्था: स पुमांल्लोके यस्याऽर्था: स च जीवति।।
अर्थ: धन विश्व को चलाने वाली एकमात्र शक्ति है। जिनके पास धन है, उन्हीं के मित्र तथा संबंधी होते हैं। धनी होने के कारण उन्हें ही वास्तविक पुरूष या महिला माना जाता है। धनी होने से ही उन्हें मूर्ख होने पर भी बुद्धिमान, विद्वान तथा योग्य माना जाता है।
शुन: पुच्छमिव व्यर्थ जीवितं विद्या विना।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे।।
अर्थ: एक कुत्ते की पूंछ कभी भी उसके लिए गर्व का विषय नहीं होती, न हीं यह उसके शरीर से मक्खी, मच्छर उड़ाने के काम आती है। कम जानने वाले मनुष्य की बुद्धि भी इसी तरह व्यर्थ होती है। अत: उसे अधिक से अधिक सीखना चाहिए।
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम्।।
अर्थ: क्रोध मृत्यु को आमंत्रण देता है, लालच दुख को आमंत्रित करता है। विद्या दूध देने वाली गाय के समान है जो मनुष्य की हर जगह रक्षा करती है तथा संतोषी व्यक्ति कही भी आसानी से जीवन निर्वाह कर सकता है।
प्रातद्र्यूतप्रसंगेन मध्यान्हे स्त्रीप्रसंड्गत:।
रात्रौ चौर्यप्रसंगेन कालो गच्छत्यधीमताम्।।
अर्थ: बुद्धिमान पुरूषों को अपना समय अध्ययन तथा मनन में बिताना चाहिए। उन्हें सुबह उठ कर जुआरियों की कहानी (महाभारत), दिन में स्त्रियों के क्रिया-कलापों तथा रात को चोरों की गतिविधियों के बारे में पढ़ना चाहिए।
इस श्लोक में चाणक्य ने महाभारत तथा रामायण के उदाहरणों का उल्लेख किया है। जुआरियों की कहानी से तात्पर्य युधिष्ठिर से है जिन्होंने जुए में न केवल अपने राज-पाट को हार दिया वरन पत्नी द्रौपदी को भी भरी सभा में निर्वस्त्र होने के लिए विवश कर महाभारत के युद्ध की नींव रखी। इसी तरह स्त्रियों के क्रिया-कलाप से उनका उल्लेख रामायण में कैकयी तथा शूर्पनखा की कहानी से हैं। कैकयी ने जहां अपनी जिद से राम के लिए वनवास मांग राजा दशरथ की मृत्यु और भरत की शत्रुता का अपराध किया था, वहीं शूर्पनखा अपने महाबली भाई रावण तथा उसके पूरे परिवार के अंत का कारण बनी।
अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदा:।
सेवितव्यं मध्याभागेन राजा बहिर्गुरू: स्त्रियं:।।
अर्थ: किसी भी आदमी को राजा (अथवा वरिष्ठ अधिकारी), आग तथा स्त्रियों से न तो दूर रहना चाहिए और न ही इनके अधिक पास जाना चाहिए। राजा किसी भी देश का प्रमुख होता है, उससे दूर रहने पर सम्मान, नौकरी तथा धन नहीं मिलता जबकि अधिक पास जाने पर अपमान, कैद या अन्य तरह का डर रहता है। इसी तरह अग्नि से अधिक दूरी होने पर न तो खाना पकाया जा सकता है, न ही कोई अन्य लाभ उठाया जा सकता है। परन्तु अग्नि के नजदीक जाते ही आग से हाथ जल जाता है। इसी तरह स्त्री के अधिक निकट जाने से उसकी ईर्ष्या का तथा अधिक दूर जाने पर उसकी घृणा तथा निरपेक्षता का शिकार होना पड़ता है। इसीलिए इन तीनों से सदैव एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखनी चाहिए ताकि व्यक्ति को सदैव फायदा होता रहे।
अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम।
जने दहति संसर्गो वने सड्गविवर्जनम्।।
अर्थ: एक अनुशासनहीन व्यक्ति सदा ही स्वयं दुखी रहता है तथा दूसरों को दुखी करता है। जब वह समाज में रहता है तो वह नियमों को तोड़ कर दूसरे लोगों तथा स्वयं के लिए कठिनाईयां पैदा करता है। जब उसी व्यक्ति को जंगल में अकेला छोड़ दिया जाता है तो वह वहा सखा या साथ नहीं होने की वजह से परेशान हो जाता है। साधारण शब्दों में बिना अनुशासन के व्यक्ति क भी भी कही भी किसी भी हालत में सुख से नहीं रह सकता।
Published on:
27 Jan 2018 09:59 am
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