" भू: से चला हुआ अग्नि
भुव: को पार करके स्व: में जा रहा है। स्व: को संस्कृत में स्वर्ग वाची बताया गया
है। स्व: प्रत्यक्ष है, आदित्य से सम्बद्ध है जिसके एक दूसरे से बड़े 12 मंडल रूप
विभाग हैं। इसका पौराणिक विवेचन जब देखते हैं तब इसका स्पष्टीकरण बहुत विशद् रूप
में होता है। वहां कहा गया है कि सूर्य के साथ हजारों सर्प, हजारों पक्षिगण हजारों
असुर, हजारों देवगण उदित हो रहे हैं। वे सिर्फ देखने के लिए उदित नहीं हो रहे हैं,
बल्कि उन सबका क्रियामय कर्म चल रहा है। इधर अमृतभाव भी आ रहा है उधर विषभाव भी आ
रहा है। सम्मिश्रित होकर पृथ्वी तक आ रहे हैं और यहां नीचे समुद्र में उनका मन्थन
हो रहा है। मन्थन द्वारा जो किनारे पर पांक आ रहा है- वायु उसमें बन्द होकर
बुंदबुंद, पांक-कीचड़ सिक्ता सूख कर पृथ्वी का रूप बनता चला जा रहा
है।