
Jain Ashtanhika festival: जैन युवा अष्टान्हिका पर्व में कैसे खुद कर रहे डेटॉक्स? (फोटो सोर्स- Patrika)
Jain Ashtanhika festival: वर्षा ऋतु के साथ आषाढ़ अष्टान्हिका महापर्व पूरे श्रद्धाभाव से मनाया जा रहा है। आठ दिवसीय यह पर्व आगामी चार माह के चातुर्मास (वर्षायोग) का प्रवेश द्वार माना जाता है। मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्थित देश के सबसे बड़े जैन तीर्थों में से एक पिसनहारी मढ़ियाजी तीर्थ विशेष धार्मिक आयोजन और साधना चल रही है। डिजिटल दौर की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और रील्स से दूरी बनाकर आत्मसंयम की राह पर चल पड़ी है।
दयोदय तीर्थ स्थित पूर्णायु आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य डॉ. स्वप्निल सिंघई के अनुसार सूर्यास्त से पहले भोजन और उपवास से शरीर की ऑटोफेजी प्रक्रिया सक्रिय होती है, जिससे पुरानी और क्षतिग्रस्त कोशिकाएं नष्ट होती हैं तथा शरीर है। की जैविक घड़ी संतुलित रहती उनका कहना है कि लगातार स्क्रीन से दूर रहने से डोपामाइन का स्तर संतुलित होता है, जिससे एकाग्रता बढ़ती है और नींद की गुणवत्ता में सुधार आता है। वर्णी गुरुकुल पिसनहारी मढियाजी के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी जिनेश भैया का कहना है कि यदि प्राचीन परंपराओं को सही अर्थों में समझा जाए तो आज का युवा अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।
पर्व के दौरान खान-पान में भी विशेष संयम अपनाया जा रहा है। सूक्ष्म जीवों की रक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से आलू, प्याज, अदरक, गाजर जैसे कंदमूल का पूरी तरह त्याग किया गया है। मढियाजी और लॉर्डगंज की जैन भोजनशालाओं में उबले पानी और मर्यादित सात्विक भोजन की व्यवस्था की गई है।
दर्जनों युवाओं ने अष्टान्हिका के दौरान डिजिटल उपवास (डिजिटल डिटॉक्स) का संकल्प लिया है। मोबाइल का उपयोग केवल अत्यावश्यक कार्यों तक सीमित कर दिया गया है। इसके साथ ही कई युवा एकाशन, निर्जल उपवास और सूर्यास्त से पहले भोजन जैसे कठिन नियमों का पालन कर रहे हैं।
दिगंबर जैन समाज के विशेष धार्मिक पर्वो के तहत इन दिनों अष्टान्हिका महापर्व चल रहा है। बुधवार को जैन मंदिरों में नन्दीश्वर मंडल विधान का पूजन हुआ। विधान से पूर्व भगवान शांतिनाथ के अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। नन्दीश्वर द्वीप में आठ अर्घ्य अर्पित किए गए। विधान के लिए नगर के जिनालयों में प्रतिष्ठाचार्यों का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। ममता का विसर्जन ही समर्पण जैन पंचायत सभा के अध्यक्ष कैलाश जैन ने बताया कि लार्डगंज स्वर्ण मंदिर सहित अन्य जैन मंदिरों में नन्दीश्वर दीप मण्डल विधान किया गया। जिसमें श्रद्धालुओं ने नन्दीश्वर दीप की पूजा अर्चना की।
पिसनहारी की मढ़िया में विधानाचार्य ने इस अवसर पर कहा कि ममता का विसर्जन ही गुरु, भगवान के चरणों में समर्पण हैं। पूजन के द्वितीय दिवस पर पिसनहारी की मढिया में 08 अर्घ्य से नन्दीश्वर द्वीप में पूजन किया गया। इस मौके पर जैन सन्तों व साध्वियों ने समाजजनों को प्रवचन देते हुए कहा कि सिद्ध चक्र विधान मे सभी विधान समाहित है। इस विधान की पूजा अर्चना करने से असंख्य पुण्यों की प्राप्ति होती है। सिद्ध का अर्थ हैं जिन्होंने सिद्धियों को अपने में आत्मशात कर लिया हो। ब्रह्मचारिणी बबली दीदी ने बताया कि नन्दीश्वर द्वीप के पूजन व प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे।
Updated on:
23 Jul 2026 03:51 pm
Published on:
23 Jul 2026 03:51 pm
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