
char dham yatra young
सनातन धर्म में चार धाम यात्रा का अत्यधिक महत्व बताया गया है। चारों धाम देश की चार दिशाओं में उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वर, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारिका के नाम से प्रसिद्ध हैं।
माना जाता है कि आद्य शंकराचार्य ने देश को एकता के सूत्र में बांधने के लिए चार धाम तथा 12 ज्योर्तिलिंगों को सूचीबद्ध कर इन तीर्थ स्थलों की यात्रा का आरंभ किया था। इसके पीछे उनका उद्देश्य था कि देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोग पूरे भारत की विविधता तथा अनेकता में एकता के भाव लिए भारतीय संस्कृति से परिचित हो सके।
प्राचीन पुराणों के अनुसार ये चारों धामों भगवान शिव तथा भगवान विष्णु की आराधना के स्थल हैं तथा देश की प्राचीन संस्कृति और परंपरा से जुड़े हुए हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इन तीर्थस्थलों के दर्शन से व्यक्ति के समस्त पाप कट जाते हैं तथा मृत्योपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये चार धाम इस प्रकार हैं।
बद्रीनाथ धाम
उत्तर दिशा में स्थित बद्रीनाथ धाम में नर-नारायण की पूजा होती है। यहां एक अखण्ड दीप जलता रहता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यहां वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
रामेश्वर धाम
दक्षिण दिशा में स्थित रामेश्वर धाम में भगवान शिव की पूजा लिंग रूप में की जाती है। इस शिवलिंग को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।रामेश्वरम चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है। दक्षिण में रामेश्वरम की वही मान्यता है जो उत्तर में काशी की है।
पुरी धाम
पश्चिम दिशा में स्थित पुरी धाम भगवान कृष्ण को समर्पित है। यहां उनकी जगन्नाथ के रूप में पूजा की जाती है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। इस मंदिर का वार्षिक रथ यात्रा उत्सव प्रसिद्ध है। यहां मुख्य रूप से भात का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
द्वारिका धाम
देश के पश्चिमी द्वार पर स्थित द्वारिका धाम भगवान कृष्ण द्वारा बसाई गई थी। कहा जाता है कि असली द्वारिका तो पानी में समा चुकी है परन्तु इस भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़ने के कारण इसे आज भी पवित्र माना जाता है।
Published on:
09 May 2016 12:50 pm
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