कानपुर. अपनी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात भगवान
शिव ने समय-समय पर कई अवतारों की प्राप्ति की थी। पुराणों में भगवान शिव के
कई अवतार विख्यात हैं लेकिन उनमें से कुछ ही ऐसे अवतार हैं जिन्हें हम
प्रमुख रूप से याद करते हैं। इन्हीं प्रमुख अवतारों में से एक है वृषभ। शिव
का यह अवतार
एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य को पूर्ण करने के लिए लिया गया था। वृषभ एक
बैल था जिसने देवताओं को भगवान विष्णु के क्रूर पुत्रों के अत्याचारों से
मुक्त करवाने के लिए पाताल लोक में जाकर उन्हें मारा था।
वृषभ अवतार लेने के पीछे मंशा क्या थी?
समुद्र मंथन के पश्चात उसमें से कई वस्तुएं प्रकट हुई थीं जैसे कि हीरे, चंद्रमा, लक्ष्मी, विष, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, अमृत से भरा हुआ पात्र, व अन्य वस्तुएं। समुद्र से निकले उस अमृत पात्र के लिए देवताओं व दानवों के बीच भयंकर युद्ध
हुआ था और अंत में वह पात्र दानवों के ही वश में आ गया। इसके पश्चात उस
पात्र को पाने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु की मदद ली। शिव की दिव्य
प्रेरणा की मदद से विष्णु ने अत्यंत सुंदरी के रूप ‘मोहिनी’ को धारण किया व
दानवों के समक्ष प्रकट हुए। अपनी सुंदरता के छल से वे दानवों को विचलित करने में सफल हुए और अंत में उन्होंने उस अमृत पात्र को पा लिया।
ऐसे पहुंचे भगवान विष्णु पताललोक
अमृत पात्र को बचाने के लिए भगवान विष्णु
ने अपने मायाजाल से ढेर सारी अप्सराओं की सर्जना की। जब दानवों ने इन
अप्सराओं को देखा तो उनसे आकर्षित हो वे उन्हें जबरदस्ती अपने निवास पाताल
लोक ले गए। इसके पश्चात जब वे अमृत पात्र को लेने के लिए वापस लौटे तब तक
सभी देवता उस अमृत का सेवन कर चुके थे। इस घटना की सूचना जब दानवों को मिली
तो इस बात का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने देवताओं पर फिर से आक्रमण कर
दिया। लेकिन इस बार दानवों की ही हार हुई और अपनी जान को बचाते हुए दानव
अपने निवास पाताल की ओर भाग खड़े हुए।
दानवों का पीछा करते हुए भगवान विष्णु
उनके पीछे पाताल लोक पहुंच गए और वहां सभी दानवों का विनाश कर दिया। पाताल
लोक में भगवान विष्णु द्वारा बनाई गई अप्सराओं ने जब विष्णु को देखा तो वे
उन पर मोहित हो गईं और उन्होंने भगवान शिव से विष्णु को उनका स्वामी बन
जाने का वरदान मांगा। अपने भक्तों की मुराद पूरी करने वाले भगवान शिव ने
अप्सराओं का मांगा हुआ वरदान पूरा किया और विष्णु को अपने सभी धर्मों व कर्तव्यों को भूल अप्सराओं के साथ पाताल लोक में रहने के लिए कहा।
और फिर हुए थे शिव वृषभ रूप में प्रकट
भगवान
विष्णु के पाताल लोक में वास के दौरान उन्हें अप्सराओं से कुछ पुत्रों की
प्राप्ति हुई थी लेकिन यह पुत्र अत्यंत दुष्ट व क्रूर थे। अपनी क्रूरता के
बल पर विष्णु के इन पुत्रों ने तीनों लोकों के निवासियों को परेशान करना शुरू कर दिया। उनके अत्याचार से परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव के समक्ष प्रस्तुत हुए व उनसे
विष्णु के पुत्रों को मारकर इस समस्या से मुक्त करवाने के लिए प्रार्थना
की। देवताओं की परेशानी को दूर करने के लिए भगवान शिव एक बैल यानि कि
‘वृषभ’ के रूप में पाताल लोक पहुंच गए और वहां जाकर भगवान विष्णु के सभी
पुत्रों को मार डाला।
मौके पर पहुंचे भगवान विष्णु ने जब अपने पुत्रों को
मृत पाया तो वे क्रोधित हो उठे और वृषभ पर अपने शस्त्रों के उपयोग से वार
किया लेकिन उनके एक भी वार का वृषभ पर कोई असर ना हुआ।
तो विष्णु ने भगवान शिव की थी प्रशंसा
वृषभ
भगवान शिव का ही रूप था और कहा जाता है कि शिव व विष्णु शंकर नारायण का
रूप थे। इसलिए युद्ध चलने के कई वर्षों के पश्चात भी दोनों में से किसी को भी
किसी प्रकार की हानि ना हुई और अंत में जिन अप्सराओं ने विष्णु को अपने
वरदान में बांध कर रखा था उन्होंने भी विष्णु को उस वरदान से मुक्त कर
दिया। इसके पश्चात जब विष्णु को इन बातों का संज्ञान हुआ तो उन्होंने भगवान
शिव की प्रशंसा की। अंत में भगवान शिव ने विष्णु को अपने लोक ‘विष्णुलोक
या वैकुंठ’ वापस लौट जाने को कहा। भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र पाताल
लोक में ही छोड़ जाने का फैसला किया और वैकुंठ लौटने पर उन्हें भगवान शिव
द्वारा एक और सुदर्शन चक्र की प्राप्ति हुई।