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जानें साल 2017 की अंतिम एकादशी का खास महत्व

मन में संकल्‍प लेते हुए इस दिन किसी की बुराई और अपशब्‍दों के प्रयोग करने से बचें।

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नई दिल्ली। आज साल 2017 की अंतिम एकादशी है। इस एकादशी को बैकुंठ एकादशी कहा गया है। जबकि उत्तर भारत में इसे पुत्रदा एकादशी के नाम से जाता जाता है। पद्मपुराण के अनुसार पूरे साल की एकादशी का पुण्य मात्र इस एकादशी के करने से मिल जाता है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु के लोक का दरवाजा खुला रहता है और पुण्यात्माओं को बैकुंठ में प्रवेश मिलता है। इस एकादशी व्रत को रखनेवालों को दशमी से ही शुद्ध सात्विक भोजना खाना शुरू करना होता है। एकादशी के दिन सुबह स्‍नान के पश्‍चात सूर्य को जल अर्पित करके भगवान विष्‍णु की पूजा करनी चाहिए। पूजा में पांच फल और कुछ मीठा का भोग लगाकर व्रती को धूप और दीप से पूजा करनी चाहिए। मन में संकल्‍प लेते हुए इस दिन किसी की बुराई और अपशब्‍दों के प्रयोग से बचें।

प्राचीनकाल कथाओं के अनुसार भ्रदावतीपुरी के राजा सुकेतमान और उनकी पत्‍नी चंपा संतान सुख से वंचित थे। दुखी राजा एक दिन वन की ओर चल दिए। वहां उनकी भेंट ऋषि-मुनियों से हुई। उन्‍होंने मुनियों को अपनी पीड़ा बताई। मुनियों ने कहा कि हे राजन, आपने बड़े ही शुभ दिन पर यह प्रश्न किया है, आज पौष शुक्ल एकादशी तिथि है। इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। आप इसका व्रत रखें तो निश्चित ही संतान की प्राप्ति होगी।

व्रत के पुण्‍य से रानी चंपा कुछ समय पश्‍चात गर्भवती हुईं और उन्‍हें पुत्र की प्राप्ति हुई। आगे चलकर उनकी संतान धर्मात्‍मा हुई। एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।


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