ये हैं मां दुर्गा के सिद्धपीठ, जहां मिलता है मनचाहा आशीर्वाद

अलग-अलग रूपों में विराजती हैं देवी मां...

By: दीपेश तिवारी

Updated: 01 Apr 2020, 02:17 PM IST

नवरात्र यानि देवी मां के वे नौ दिन जब हम सब मां की भक्ति में लीन रहने के साथ ही शक्ति की उपासना करते हैं। इन नौ रातों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है। पौष, चैत्र, आषाढ,अश्विन मास में प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिनको क्रमशः नंदा देवी, रक्ततदंतिका,शाकम्भरी, दुर्गा,भीमा और भ्रामरी नवदुर्गा कहते हैं।

उत्तरांचल को देश में देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस क्षेत्र को देवभूमि कहलाने के पीछे भी एक खास वजह है। दरअसल ऋषि मुनियों ने सैकड़ों साल तपस्या करके इसे दिव्यभूमि बनाया है, जिसका वैभव पाने के लिए श्रद्धालु मीलों की यात्रा करके अपने भगवान के दर्शन को आते हैं।

मान्यता के अनुसार उत्तरांचल भगवान शिव एवं माता पार्वती की स्थली हैं। देवभूमि के पहाड़, पत्थर, नदियां सभी पवित्र हैं और श्रद्धालुओं को भोग एवं मोक्ष देने वाले शंकर यहां के कण-कण में विराजमान हैं। फिर शिव का अर्थ भी तो कल्याणकारी है और शिव ही शंकर हैं। इन्हीं सब कारणों के चलते यह क्षेत्र देवभूमि कहलाता है।

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ये भी हैं कारण...
1. पूरे भारत की सबसे विशाल और पवित्रत नदियां देवभूमि उत्तरांचल से निकलती हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती नदी का उद्गम स्थल भी उत्तरांचल ही है।

2. भगवान शिव का ससुराल है उत्तरांचल का दक्ष प्रजापति नगर।

3. पाण्डवों से लेकर कई राजाओं ने तप करने के लिए इस महान भूमि को चुना है। ध्यान लगाने के लिए महात्मा इस जगह को उपयुक्त मानते हैं और आते हैं। कई साधुओं ने यहां स्तुति कर सीधा ईश्वर की प्राप्ति की है। पाण्डव अपने अज्ञातवास के समय उत्तरांचल में ही आकर रुके थे।

मां दुर्गा के सिद्धपीठ
वहीं देवी मां को पहाड़ों वाली कहलाने का कारण भी उनके पहाड़ों पर निवास के कारण ही है, ऐसे में उत्तरांचल में कहीं पर्वत शिखर पर तो कहीं नदी के तट पर मां दुर्गा अलग-अलग रूपों में विराजती हैं और इनमें से कई स्थान सिद्धपीठ के रूप में जाने जाते हैं, जहां भक्तों की मनोकामनाएं माता पूरी करती हैं। नवरात्रि पर आज पत्रिका यहां के ऐसे ही 11 सिद्धपीठों की बात करने रहा हैं, जहां नवरात्र में जाकर आप अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं।

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1. मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार
मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इसलिए इनका नाम मनसा पड़ा। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में भी पूजा जाता है।
मनसा देवी के मंदिर का इतिहास बड़ा ही प्रभावशाली है। इनका प्रसिद्ध मंदिर हरिद्वार शहर से लगभग 3 किमी दूर शिवालिक पहाड़ियों पर बिलवा पहाड़ पर स्थित है। यह जगह एक तरह से हिमालय पर्वत माला के दक्षिणी भाग पर पड़ती है।

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2. दूनागिरि मंदिर, द्वाराहाट
देवभूमि उत्तरांचल में मां दूनागिरि मंदिर अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र से 15.1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह मंदिर द्रोणा पर्वत की चोटी पर स्थित है। मां दूनागिरी मंदिर को ‘द्रोणगिरी’ के नाम से भी जाना जाता है।
इस पर्वत पर पांडव के गुरु द्रोणाचार्य द्वारा तपस्या करने पर इसका नाम द्रोणागिरी पड़ा था। इस मंदिर का नाम उत्तराखंड सबसे प्राचीन व सिद्ध शक्तिपीठ मंदिरो में आता है। मां दूनागिरी का यह मंदिर ‘वैष्णो देवी के बाद उत्तराखंड के कुमाऊं में दूसरा वैष्णो शक्तिपीठ है।

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3. पूर्णागिरि मंदिर, टनकपुर
प्रसिद्ध सिद्धपीठों में से एक मां पूर्णागिरि मंदिर टनकपुर से लगभग 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। चैत्र की नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। यह महाकाली की शक्तिपीठ है और मान्यता के अनुसार यहां मां सती की नाभि गिरी थी।

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4. नंदा देवी मंदिर, कुरुड़ (चमोली)
कुरुड़ में नंदा देवी का मंदिर गांव के शीर्ष पर देवसरि तोक पर स्थित है। कुरुड़ नंदा को राजराजेश्वरी के नाम से भी पुकारा जाता है। वहीं अल्मोड़ा में भी नंदा देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है।
कुमाऊं क्षेत्र के पवित्र स्थलों में से एक नंदा देवी मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। इस मंदिर का इतिहास 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। कुमाऊंनी शिल्पविधा शैली से निर्मित यह मंदिर चंद वंश की ईष्ट देवी को समिर्पत है।


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5. अखिलतारिणी मंदिर, लोहाघाट, चम्पावत
मां अखिलतारणी मंदिर को उप शक्तिपीठ माना जाता है जो घने हरे देवदार वनों के बीच में स्थित है। मान्यता के अनुसार यहां पांडवों ने घटोत्कच का सिर पाने के लिए मां भगवती से प्रार्थना की थी।

6. कसार देवी मंदिर, अल्मोड़ा
अल्मोड़ा में कसार पर्वत पर स्थित कसार देवी मंदिर अद्वितीय और चुंबकीय शक्ति का केंद्र माना जाता है। कहा जाता है इस शक्तिपीठ में मां दुर्गा साक्षात प्रकट हुई थीं।
मान्यता के अनुसार देवी कात्यायनी यहां शेर पर सवार होकर प्रकट हुईं थीं, वहीं इस क्षेत्र में आज भी दुनिया की सबसे ज्यादा चुंबकीय किरणें महसूस की जाती हैं।

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7. नैना देवी मंदिर, नैनीताल
नैना देवी मंदिर नैनीताल में नैनी झील के उत्तरी किनारे पर स्थित है। यहां सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है। मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं।

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8. चैती (बाल सुंदरी) मंदिर, काशीपुर
माता चैती (बाल सुंदरी) मंदिर काशीपुर में स्थित है। यहां चैती मेला के नाम से चैत्र मास में प्रसिद्ध मेला लगता है। आदिशक्ति की बाल रूप में पूजा होने के कारण इसे बाल सुंदरी मंदिर कहा जाता है।

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9. चण्डी देवी, हरिद्वार
देश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल चंडी देवी मंदिर नील पर्वत के शिखर पर स्थित है। यह प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस मंदिर की मूर्ति को महान संत आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में स्थापित किया था।

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10. चन्द्रबदनी मंदिर, देवप्रयाग
देवप्रयाग में स्थित मां चन्द्रबदनी मंदिर शक्तिपीठों और माता सती के पवित्र स्थलों में से एक है। यह शक्तिपीठ चंद्रकूट पर्वत के ऊपर स्थित है।

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11. सुरकंडा देवी मंदिर, कद्दूखाल, टिहरी
सुरकंडा देवी मंदिर टिहरी क्षेत्र में सुरकुट पर्वत पर लगभग 2757 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है।
यह मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है जो कि नौ देवी के रूपों में से एक है। यह मंदिर 51 शक्ति पीठ में से है। इस मंदिर में देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। केदारखंड व स्कंद पुराण के अनुसार राजा इंद्र ने यहां मां की आराधना कर अपना खोया हुआ साम्राज्य प्राप्त किया था।

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