
बायोमैट्रिक सत्यापन रोकेगा फर्जीवाडा, डिजिटल से होगी सिलिकोसिस मरीज की पहचान
धौलपुर. प्रदेश में अब सिलिकोसिस मरीजों की पहचान डिजिटल तरीके से की जाएगी। लगाातर फर्जीवाड़े की शिकायत सामने आने के बाद नोडल चिकित्सा विभाग एवं सामाजिक न्याय अधिकारी विभाग ने अब सिलिकोसिस मरीजों को बायोमैट्रिक सत्यापन कराना जरूरी कर दिया। अभी तक बिना बायोमैट्रिक सत्यापन के कई जिलों में फर्जी तरीके से सिलिकोसिस मरीज की रिपोर्ट दिखाकर सरकार की ओर से दी जाने वाली 3 लाख की राशि निकाल ली गई थी। कथित एनजीओ के तहत सक्रिय दलाल जुगाड़ से काम करवाते थे। लेकिन अब विभाग ने नियमों में बदलाव कर दिया है। विभाग जल्द ही इसको शुरू करने वाला है। अगले दो सप्ताह में जिला अस्पताल में बायोमैट्रिक प्रक्रिया से मरीजों की पहचान शुरू हो जाएगी।
जिला अस्पताल के टीबी विभाग में सिलिकोसिस संदिग्ध मरीज का आवेदन के बाद उन्हें अस्पताल में बायोमैट्रिक सत्यापन कराना होगा। उसके बाद संदिग्ध का डिजिटल एक्सरे किया जाएगा। एक्स-रे होने के बाद उसको एक्स-रे टैक्नीशियन पोर्टल पर अपलोड करेगा। अपलोड होने के बाद संबंधित व्यक्ति का डाटा मिलान किया जाएगा। जिसके बाद चिकित्सक सभी जांचों के रिजल्ट को आधार मानकर ही चिकित्सक अपनी ओपिनियन देगा। इतना ही नहीं सिलिकोसिस प्रमाण पत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया में हर मरीज का बायोमेट्रिक रिकॉर्ड रखा जाएगा। अभी तक 188 व्यक्तियों में सिलिकोसिस की रिपोर्ट पॉजिटिव मिल चुकी है। जिसकी रिपोर्ट अधिकारियों को भेज दी गई है। उनको विभाग की ओर से अनुराशि राशि खाते में भेजी जाएगी।
135 मरीजोंं का होना है सत्यापन
टीबी विभाग के डॉ. गोविंद मीणा ने बताया कि 135 मरीजों का सत्यापन होना है। जिनकी सूचना विभाग के पास ई-मित्र पोर्टल से पहुंच गई है। वहीं अभी 65 व्यक्तियों ने सिलिकोसिस अपने को बताते हुए ई-मित्र से आवेदन किया है। लेकिन विभाग के पास अभी इनका डाटा पहुंचते ही पहले इनकी बायोमैट्रिक कराई जाएगी। जिसमें आवेदन के साथ आधार कार्ड से डाटा मिलाया जाएगा। उसके बाद एक्स-रे होने के बाद जांच रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड की जाएगी। कुछ जिलों से जानकारी मिली थी कि भरतपुर संभाग समेत अन्य में सिलिकोसिस बीमारी के प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में करोड़ों रुपए का फर्जीवाड़ा कर अनुदान राशि निकाल ली थी। जिसके बाद सरकार ने पूरी व्यवस्था में बदलाव किया है।
खदान क्षेत्र में लगातार कार्य करने से होती है बीमारी
सिलिकोसित बीमारी उन लोगों में ज्यादा होती है, जो श्रमिक खदानों में लगातार काम करते हैं। सिलिका युक्त धूल में सांस लेने से फेफड़ों पूरी तरह से खराब हो जाते हैं। सिलिकोसिस से पीडि़त श्रमिकों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए राज्य सरकार ने सिलिकोसिस नीति 2019 लागू की थी। जिसमें मरीजों को आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। लेकिन कुछ लोगों ने फायदा उठाया शुरू कर दिया है। यहां दौसा जिले में सामने आए भष्टाचार में देखी गई। जिले में सरमथुरा उपखण्ड समेत कई इलाकों में इसके मरीज सामने आते रहते हैं। वहीं, पड़ोसी जिले भरतपुर में बयाना, रुदावल, गढ़ीबाजना, पहाड़ी, भुसावर क्षेत्र में बड़ी संख्या में पीडि़त मरीज हैं।
अभी तक ऐसे करते थे आवेदन
- ई-मित्र से संदिग्ध मरीज आवेदन करता हैं
- आवेदन में मरीज अपनी पहचान भरते थे
- जिसके बाद एक्स-रे अस्पताल में होता था
- चिकित्सक को पोर्टल पर रिपोर्ट मिलती थी
- फिर सिलिकोसिस साबित होने पर दवा व 3 लाख राशि दी जाती थी
अब इन चरण से गुजरना होगा
- ई-मित्र से आवेदन में सभी निशान चिंह बताना होगा
- अस्पताल में आवेदन मिलते ही बायोमैट्रिक की जाएगी
- इसके बाद सही डाटा मिलान होने पर एक्स-रे होता हैं
- एक्स-रे को पोर्टल पर अपलोड किया जाता हैं
- रिपोर्ट चिकित्सक को मिलते कार्रवाई की जाती हैं
लाखों का अनुदान देती सरकार
- सिलिकोसिस बीमारी होने पर मरीजों को दिए जाते है 3 लाख रुपए
- इसके बाद यदि मरीज की होती है मौत तो परिवार को दो लाख रुपए
- इसके साथ ही अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपए की सहायता
- सिलिकोसिस मरीज को 1000 से 1500 रुपए तक पेंशन का भी प्रावधान
- सिलिकोसिस मरीज की अब पहले बायोमैट्रिक से सत्यापन किया जाएगा। विभाग की ओर से अब बदलाव कर दिया गया है। नए आवेदन करने वाले संदिग्ध मरीजों को इस प्रक्रिया से होकर रिपोर्ट साबित होने के बाद ही उनको अनुदान राशि दी जाएगी।
- डॉ. समरवीर सिंह सिकरवार, पीएमओ जिला अस्पताल धौलपुर
Published on:
02 Dec 2023 06:40 pm
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