
मोबाइल फोन में खोए बच्चे, बोलना तक नहीं सीख पा रहे, वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार हो रहे छोटे बच्चे
मोबाइल फोन में खोए बच्चे, बोलना तक नहीं सीख पा रहे, वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार हो रहे छोटे बच्चे
- कई शब्दों का उच्चारण नहीं कर पा रहे बच्चे, अभिभावकों को इशारों से समझा रहे
- जिला अस्पताल में प्रतिदिन पहुंच रहे ऑटिज्म के केस
अंबर अग्निहोत्री
धौलपुर. छोटे बच्चों को मोबाइल फोन थमा कर अपने काम या मनोरंजन में व्यस्त रहने वाले अभिभावक बच्चों को गंभीर बीमारी की ओर ढकेल रहे हंै। पारिवारिक व सामाजिक माहौल से दूर यह बच्चे बोलना तक नहीं सीख पा रहे हंै। कोशिश करने पर उनके मुंह से (म, ए, ऐं, ऊ) जैसी आवाज ही निकल पा रही है। इसके चलते उन्हें इशारों से काम चलाना पड़ रहा है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में वर्चुअल ऑटिज्म (आभासी आत्मकेंद्रित) से पीडि़त ऐसे बच्चों का स्कूलों में प्रवेश भी नहीं हो पा रहा है। यह समस्या 02 से 5 साल तक के बच्चों में देखने को मिल रही है।
यहां जिला अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन मानसिक रोग विभाग में ऐसे कई मामले सामने आ रहे है। जिनमें बच्चे बोलना नहीं सीख पा रहे हैं। अभिभावक अस्पताल में चिकित्सकों से इसकी सलाह और इलाज कराने पहुंच रहे हंै। ऐसे बच्चे भी इसमें शामिल हैं जिनका मोबाइल पर प्रतिदिन औसत स्क्रीन टाइम में तीन से चार घंटे व्यतीत हो रहा है। अभिभावक चिकित्सकों के पास राय लेने के लिए पहुंच रहे हंै। मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ.सुमित मित्तल ने बताया कि ऐसे मामले प्रतिदिन आ रहे हैं जिसमें बच्चे स्पष्ट नहीं बोल पा रहे। 100 से अधिक बच्चों में डिले स्पीच (आवाज देर से निकलना या हकलाना) की समस्या देखने को मिल रही है। इन बच्चों का दिमाग तो चल रहा है। लेकिन जुबान पर भाषा के रूप में परिवर्तित नहीं हो पा रहा है। 20 बच्चे ऐसे मिले जो कहने पर कुछ समझ नहीं पा रहे थे। उनसे उठने या पानी लाने के लिए बोला गया तो वह समझ नहीं पाए। हाल ये है कि कई बच्चों को भोजन के समय मोबाइल देखने की लत पड़ गई है। अभिभावक फोन नहीं दे तो वह भोजन तक नहीं करते हैं। जिससे अभिभावक भी परेशान नजर आ रहे हैं।
क्या होता है वर्चुअल ऑटिज्म
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक तंत्रिका विकास संबंधी विकार है। यह कमजोर इम्यून सिस्टम और तंत्रिका सूजन के कारण होता है। ऐसा ज्यादातर तब होता है जब हम सामाजिक परिवेश और आसपास से अलग या कट जाते हैं। या फिर हमें किसी व्यक्ति या परिजनों से बातचीत करने में परेशानी आती है।
क्या हैं उपाय
- बच्चों को कम से कम मोबाइल दें, दूसरे खेलों में व्यस्त रखें।
- सुबह-शाम बच्चों को बाहर खेलने के लिए भेजे अभिभावक।
- प्रतिदिन बच्चों को साथ बैठाकर भोजन करें। जिससे वह सही भोजन कर पाएगा।
- परिवार के बड़े बच्चों को ध्यान रखें और उनके साथ खेलें। जिससे मोबाइल ध्यान हटे।
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केस 01
- ओपीडी में दिखाने पहुंची धौलपुर निवासी प्राची (9) पुत्री बबलू जो काफी समय से बोलना नहीं सीख पा रही है। वो घर में आपस में होने वाली बात को भी नहीं समझ पाती है। परिजन कुछ काम की बोलते है। तो वह समझ ही नहीं पा रही कि क्या जवाब देना है। अभिभावक उसे अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाने को ले जाते हैं। लेकिन इसके कारण उसका एडमिशन नहीं हो पा रहा है।
केस 02
- धौलपुर निवासी मंयक (11) जो काफी समय मोबाइल में पब्जी गेम खेलने में बिता देता है। जिसकी वजह से उसे मोबाइल की लत लग गई है। हाल ये है कि वह बिना मोबाइल के भोजन नहीं कर पाता है। जिसके कारण अभिभावक उसे 15 दिन में दो बार अस्पताल में दिखाने पहुंच रहे हैं। मोबाइल की लत के कारण उसका स्कूल में एडमिशन भी नहीं हो पा रहा है।
बाक्स....
- 2-5 वर्ष तक के बच्चों में देखे गए ऐसे लक्षण
- 20 प्रतिशत बच्चे वर्चुअल आटिज्म से पीडि़त आ रहे है।
- 100 से अधिक बच्चे डिले स्पीच (देर से बोलने) की शिकायत
- दो से पांच वर्ष की उम्र में बच्चे की नींव तैयार होती है। इसमें वह बोलना सीखता है। संबंधों से संबंधित शब्दों की सीखता है। बोलने का अभ्यास करता है। वर्चुअल ऑटिज्म ऐसी बीमारी है। जिसका उपचार अभिभावकों के ही पास है। इससे बचाव का एक मात्र रास्ता बच्चों के साथ समय बिताना है। मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए बच्चों को दूसरे कामों में व्यस्त करना होगा। अभिभावक को स्वयं उस काम को करना होगा। बच्चा तभी देखकर सीख सकता है।
- डॉ.सुमित मित्तल, मानसिक रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल धौलपुर
Published on:
02 Apr 2023 06:19 pm
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