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धौलपुर. चंबल बजरी खनन पर पूर्ण प्रतिबंध के बाद लोगों के सामने भवन निर्माण को लेकर परेशानियां खड़ी हो रही हैं। बजरी नहीं मिलने से लोगों का रुझान एम सैंड यानी काली बजरी की ओर बढ़ रहा है, यही कारण है कि इसकी मांग दो गुना तक बढ़ चुकी है। आज से दो-तीन माह पहले 2300 रुपए में मिलने वाली एम-सैंड की ट्रॉली आज 3500 से 4000 रुपए तक में बिक रही है। शहर में बिकने वाली काली बजरी अभी मप्र के ग्वालियर जिले से आ रही है।
चम्बल नदी एक ओर जहां हजारों लोगों के लिए जीवनदायनी मानी जाती है तो वहीं सैकड़ों किलोमीटर में फैले चंबल अभयारण्य में पल रहे जीव जंतुओं का आश्रय स्थल भी है। इसी को देखते हुए अभयारण्य सीमा में बजरी खनन को पूर्ण प्रतिबंध कर दिया गया था, लेकिन बजरी माफियाओं ने अभयारण्य सीमा में दिन रात बजरी खनन कर चंबल को वह घाव दिए जिससे उसकी आगोश में पल रहे जीव जंतुओं के अस्तित्व पर बन आई। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अभयारण्य सीमा में बजरी खनन के पूर्ण रूप से प्रतिबंध के बाद बजरी के विकल्प के रूप में अब एम सैंड को देखा जा रहा है। जिसकी मांग शहर से लेकर जिले भर में देखते-देखते दो से तीन गुना तक बढ़ चुकी है। हालांकि एम सेंड का उत्पादन राजस्थान में कम ही होता है। गत दिनों पहले राजस्थान सरकार एम-सैंड को लेकर यूनिटें निर्माणों की भी घोषणा की थी, लेकिन उसका कुछ खास असर नहीं हो सका। यही कारण है कि क्षेत्र में आने वाला एम-सैंड यानी काली बजरी मप्र के ग्वालियर से आ रही है। जहां इसका उत्पादन कई कंपनियां कर रही हैं।
तीन माह पहले थी गुमनाम एम-सैंड
तीन माह पहले एम-सैंड का नाम कुछ ही लोग जानते होंगे, लेकिन जैसे ही चंबल बजरी पर प्रतिबंध लगा तो एम-सैंड की मांग तेज हो गई और आज लगभग हर भवन निर्माण कार्य में एम-सैंड का जमकर प्रयोग किया जा रहा है। तीन माह पहले एम-सैंड की एक ट्रॉली 2300 रुपए की आती थी जो आज 3500 से 4000 तक की हो चुकी है और वहीं तो वहीं सिंध और अन्य नदियों से आने वाली बजरी की ट्रॉली 5 हजार से 6 हजार रुपए में बिक रही है। राज्य सरकार और अन्य विशेषज्ञ भी एम-सैंड का बजरी का अच्छा विकल्प मानते हैं। हालांकि अभी राजस्थान में एम-सैंड का उत्पादन उतना नहीं होता जितनी अब मांग बढ़ रही है।
राज्य में 100 एम-सैंड यूनिट कार्यरत
राजस्थान में बजरी की वार्षिक मांग लगभग 80 से 90 मिलियन टन तक पहुंच गई है, जबकि राज्य में एम-सैंड का उत्पादन अभी लगभग 16 मिलियन टन है, जो कुल आवश्यकता का करीब 18 फीसदी हिस्सा है। फिलहाल राज्य में लगभग 100 एम-सैंड यूनिट कार्यरत हैं, जबकि 25 से 30 नई यूनिटें शुरू होने की तैयारी में हैं। जयपुर और भरतपुर जिले सबसे अधिक यूनिट वाले क्षेत्र बन चुके हैं। चंबल रेत राष्ट्रीय घडिय़ाल अभयारण्य क्षेत्र में होने के कारण पूर्णत: प्रतिबंधित है। इसके विकल्प के रूप में काली बजरी (एम-सैंड या स्टोन डस्ट) एक बेहतरीन, कानूनी और किफायती विकल्प है।
रेत की ट्रॉली 5000 से 6000 में
भवन निर्माण के लिए चंबल की बजरी को बेहद ही मुफीद माना गया है। यही कारण रहा है कि इसकी मांग अधिक होने के कारण बजरी माफिया सक्रिय हुए और दिन-रात चंबल में अवैध खनन किया गया। बजरी का व्यापार करने वालों ने बताया कि प्रतिबंध के बाद अब शहर में वैध रूप से आने वाली बजरी मप्र के सिंध नदी और उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से आ रही है। यहां से आने वाला रेत की ट्रॉली 5000 से 6000 रुपए तक में बिक रही है।
बजरी की तुलना में आधी कीमत
देखा जाए तो चंबल की बजरी और एम-सैंड में थोड़ा फर्क है, लेकिन निर्माण कार्य के लिए एम-सैंड भी काफी मुदीफ मानी जाती है, जो कि एक कृत्रिम रेत ही होता है, जिसका उपयोग मकानों और इमारतों के निर्माण में नदियों के रेत के विकल्प के रूप में किया जाता है? यह मुख्य रूप से कठोर ग्रेनाइट पत्थरों और चट्टानों को बड़ी मशीनों क्रशर में पीसकर और छानकर बनाई जाती है? अब इसके दाम की बात करें तो एम-सैंड नदियों की बजरी की तुलना में लगभग आधी कीमत पर ही मिल जाता है। यही कारण है कि लोग अब एम-सैंड का पसंद कर रहे हैं जिससे उनके भवन निर्माण की लागत में भी कमी आना स्वाभाविक है।
एम-सैंड के लाभ-
बजरी की तरह एक समान और नियंत्रित गुणवत्ता वाली होती है।
बजरी की अपेक्षा कम कीमती होना।
- भवन निर्माण के काफी मुफीद मानी जाती है।
- इसमें मिट्टी या गाद जैसी अशुद्धियां नहीं होतीं।
इसके उपयोग से कंक्रीट की ताकत बढ़ती है।
Published on:
14 Jun 2026 08:33 pm
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