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पापा की पीठ पर सैर कर रहे राजकुमार, नन्हे मेहमानों से चंबल गुलजार

- मादाएं मिलजुल कर कर रहीं बच्चों की देखभाल - मानसून की बाढ़ में बह जाते हैं 95 फीसदी बच्चे धौलपुर. राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैली चंबल नदी घडिय़ाल और मगरमच्छ के अंडों से निकले नन्हे मेहमानों से गुलजार हो गई है। एक ओर जहां मादा घडिय़ाल अपने बच्चों की देखभाल में जुटी हैं

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Prince walking on father's back, Chambal buzzes with little guests

पापा की पीठ पर सैर कर रहे राजकुमार, नन्हे मेहमानों से चंबल गुलजार

पापा की पीठ पर सैर कर रहे राजकुमार, नन्हे मेहमानों से चंबल गुलजार

- मादाएं मिलजुल कर कर रहीं बच्चों की देखभाल

- मानसून की बाढ़ में बह जाते हैं 95 फीसदी बच्चे

धौलपुर. राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैली चंबल नदी घडिय़ाल और मगरमच्छ के अंडों से निकले नन्हे मेहमानों से गुलजार हो गई है। एक ओर जहां मादा घडिय़ाल अपने बच्चों की देखभाल में जुटी हैं वहीं, नर घडिय़ाल उन्हें पीठ पर बैठाकर चंबल की सैर करा रहे हैं। मगरमच्छ भी अपने बच्चों की निगरानी में जुटे हैं। घडिय़ाल और मगरमच्छों ने चंबल किनारे रेत में अप्रेल माह में घोंसले बनाए थे। घडिय़ाल व मगरमच्छ के प्रत्येक घोंसले से 35 से 40 बच्चे निकलते हैं। प्रत्येक घोंसले में तीन से पांच अंडे खराब भी हो जाते हैं। धौलपुर सीमा से इटावा तक 135 मादा घडिय़ाल एवं 22 मादा मगरमच्छों ने घोसेले बनाए। इस प्रकार चंबल में घडिय़ाल के करीब साढ़े चार हजार और मगरमच्छ के आठ सौ बच्चे किलोल कर रहे हैं। हालांकि, हर वर्ष चंबल में पैदा होने वाले 95 प्रतिशत घडिय़ाल व मगरमच्छ के बच्चे जान गंवा देते हैं। बाढ़ से होता है नुकसानदरअसल, जून माह में बच्चे अंडे से बाहर आते हैं और जुलाई व अगस्त माह में नदी में बाढ़ आने के कारण अधिकतर बच्चे छोटे होने से बह जाते हैं। यही नहीं ये बच्चे घडिय़ाल-मगरमच्छ या दूसरे जानवरों का शिकार भी बन जाते हैं।बच्चों की सुरक्षा के लिए हुए आक्रामकमौजूदा समय में बच्चों की रखवाली कर रहे मगरमच्छ व घडिय़ाल अत्यधिक आक्रामक हो गए हैं। ऐसी स्थिति में चंबल नदी के किनारे इनके घोसलों के आसपास जाने पर हमले की भी आशंका है। चंबल अभयारण्य प्रशासन ने चंबल नदी किनारे बसे गांव के ग्रामीणों को नदी में नहीं जाने की सलाह दी है।अवैध खनन बना मुसीबतचंबल किनारे रेता के अवैध खनन के कारण घडिय़ाल और मगरमच्छों को प्रजनन में परेशानी हुई है। धौलपुर में पुरैनी और समोना के आस-पास इनकी नेस्टिंग हुई है। मध्यप्रदेश सीमा में रेता के अवैध खनन के कारण इनके अंडों को खासा नुकसान पहुंचा है। अब बच्चों के सामने जीवित रहने की मशक्कत है।चंबल में पर्याप्त घडिय़ाल-मगरमच्छचंबल नदी के क्षेत्रफल के मुताबिक घडिय़ाल व मगरमच्छों की संख्या पर्याप्त है। दूसरे स्थानों से लाकर यहां मगरमच्छ और घडिय़ालों को छोडऩे की जरूरत नहीं है। 165 किमी के चंबल नदी के दायरे में लगभग दो हजार के घडिय़ाल व 900 मगरमच्छ मौजूद हैं।संरक्षण से बढ़ी संख्या1975 में चंबल नदी को अभयारण्य घोषित किया गया। इटावा के पचनद तक चंबल नदी में विलुप्त होते घडिय़ालों को सुरक्षित रखने एवं उनकी संख्या बढ़ाने के लिए चंबल को अभयारण्य घोषित किया गया था। वर्ष 2007 व 2008 में घडिय़ालों की संख्या बहुत तेजी से घटने लगी थी। तब राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के वन विभाग ने इनके संरक्षण के लिए प्रयास किए थे। अब एक बार फिर चंबल नदी में घडिय़ाल व मगरमच्छ की संख्या तेजी से बढऩे लगी है।पांच किमी होता है क्षेत्रहर नर घडिय़ाल की पांच किलोमीटर की टेरेटरी (क्षेत्र) होती है। उस टेरेटरी में रहने वाली हर मादा से उसकी मेटिंग होती है। यह जरूरी नहीं कि हर मादा उस क्षेत्र में अंडे दे। मादा अंडे वहां देती है, जहां रेता होता है। कई मादाएं एक साथ मिल कर बच्चों की परवरिश करती हैं। वहीं, इन दिनों चंबल में ऐसे कई नर घडिय़ाल हैं, जो अपनी पीठ पर बच्चों को घुमाते देखे जा सकते हैं।

इनका कहना है

अप्रेल में मादा घडिय़ाल एवं मगरमच्छ अंडे देती हैं। जिनमें से 60 दिन के बाद बच्चे अंडे में से निकलते हैं। कई मादाएं मिल कर बच्चों की परवरिश करती हैं। नर बच्चों को पीठ पर बिठा सैर कराते हैं।- राजीव तोमर, मानद वन्य जीव प्रतिपालक