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रामलखन दिव्यांगता को दे रहा मात, हाथों से नही पैरों से लिख रहा किस्मत

- गांव के लोगों को विद्यालय जाता देख खुद भी पढऩे पहुंचा

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 Ram Lakhan is defeating disability, writing his destiny with his feet and not with his hands

रामलखन दिव्यांगता को दे रहा मात, हाथों से नही पैरों से लिख रहा किस्मत

dholpur, सरमथुरा पखंड क्षेत्र में बढ़ागांव के रामलखन के दोनों हाथ नहीं हैं। वह हाथ की जगह पैरों से काम करता हैं। घर के साथ बाहर के भी वह काम करता हैं पैरों से ही वह कॉपी पर लिखता हैं। जो ग्रामीण क्षेत्र में एक मिसाल बन गया है। दिव्यांग बच्चे का हौसला देख ग्रामीण आश्चर्य चकित है। जो जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग हैं। लेकिन उसके हौंसलों की उड़ान को देखकर लोग तारीफ करते नहीं थक रहे है।

रामलखन जाटव कक्षा 3 का छात्र है जो महज 10 साल की उम्र में अपनी किस्मत अपने हाथों से नहीं बल्कि पैरों की उंगलियों से लिखने लग गया है। उसका सपना पढ़ लिखकर राजकीय सेवा में जाने का है लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति देख दिव्यांग के सपने चकनाचूर हो रहे है। दिव्यांग के पिता पत्थर की खदान में मजदूरी करते है। फिर भी दोनों हाथों से दिव्यांग कक्षा 3 का छात्र रामलखन उन हजारों दिव्यांगों को जीने और जीवन में कठिनाइयों से लडऩे की रोशनी दिखा रहा है। ग्रामीणों ने बच्चे का हौसला देखते हुए मुख्यमंत्री से पढाई में सहयोग के लिए मदद मांगी है।

जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग रामलखन-

बड़ागांव में जिंदादिली की ऐसी तस्वीर सामने आई है। जो हताश और निराश लोगों के लिए एक मिसाल साबित होगी। महज 10 साल के इस बालक ने दिव्यांगता के अभिशाप को अपने दृश्य निश्चय से तोडकऱ कुछ कर गुजर जाने की ठानी है। भले ही दोनों हाथ नहीं है इन सबको पीछे छोड़ते हुए यह बालक समाज के लिए मिसाल बना हुआ है। यह बालक अपने दोनों पैरों से ऐसा कोई काम नहीं जो नहीं कर सकता है। एक आम व्यक्ति अपने हाथों से काम कर सकता है। यह बालक अपने पैरों से काम कर लेता है जो जन्म से ही दिव्यांग है।

पैरों से चलाता हैं कलम-

पढ़ाई करते वक्त रामलखन की हैंडराइटिंग ऐसी है जो आम व्यक्ति अपने हाथों से इतनी सुंदर नहीं लिख सकता हैं। जो पैरों से लिखने में बहुत माहिर हैंं विद्यालय में होने वाली पेंटिंग प्रतियोगिता में भी रामलखन ने कई जगह भाग लिया है। दिव्यांग बालक की ख्वाहिश है कि एक दिन पढ़ लिखकर वह राजकीय सेवा करे। लेकिन उसके इस सपने को साकार होने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण बताते है कि रामलखन जब धीरे-धीरे बड़ा होने लगा और उसकी उम्र स्कूल जाने की हुई तो गांव के अन्य बच्चों को स्कूल जाते देख उसका भी मन स्कूल जाने को करने लगा। उसी के बाद रामलखन ने स्कूल जाकर पढऩे की जिद कर अपने पैरों से लिखना सीखना शुरू किया।

जोश व जुनून की खातिर पीछे मुडकऱ नहीं देखा-

रामलखन का स्कूल में दाखिला होने के बाद सबसे आगे निकलने का जोश था अपने जज्बे की खातिर सामान्य बच्चों की तरह ही स्कूल में अध्ययन करने लगा। रामलखन ने कभी अपने दिव्यांग होने का किसी को अहसास नही होने दिया। ना ही बहाना बनाकर पीछे मुडकऱ देखा, कक्षा 3 के छात्र रामलखन ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर इंसान के अंदर हौसला है तो अपने लक्ष्य को किसी भी कीमत पर पा सकता है।