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सरमथुरा में दो माह से पत्थर खदानें बंद, चहुंओर पसरा सन्नाटा

-वनविभाग का लोगों में खौफ, खनिज की तोड़फोड़ से लोगों में आक्रोश डॉ. किरोड़ी, संजय शर्मा से गैंगसा उद्यमी, श्रमिक वर्ग लगा चुका गुहार dholpur, सरमथुरा क्षेत्र में पत्थर उद्योग को बंद हुए दो माह से अधिक गुजर गए हैं। गैंगसा उद्यमी, खनन मजदूर वर्ग ने राजस्थान सरकार के कृषि मंत्री डॉ किरोड़ी लाल मीणा, […]

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सरमथुरा में दो माह से पत्थर खदानें बंद, चहुंओर पसरा सन्नाटा Stone mines in Sarmathura have been closed for two months, leaving everyone in a state of silence

-वनविभाग का लोगों में खौफ, खनिज की तोड़फोड़ से लोगों में आक्रोश

डॉ. किरोड़ी, संजय शर्मा से गैंगसा उद्यमी, श्रमिक वर्ग लगा चुका गुहार

dholpur, सरमथुरा क्षेत्र में पत्थर उद्योग को बंद हुए दो माह से अधिक गुजर गए हैं। गैंगसा उद्यमी, खनन मजदूर वर्ग ने राजस्थान सरकार के कृषि मंत्री डॉ किरोड़ी लाल मीणा, वनमंत्री संजय शर्मा सहित प्रदेश संगठन के पदाधिकारियों व भाजपा जिलाध्यक्ष राजवीर सिंह राजावत से कई बार मुलाकात कर पत्थर खनन संबंधी समस्याओं से अवगत कराया है। फिर भी पत्थर व्यवसाय शुरू नही हो सका है।

पत्थर उद्योग के बंद होने से व्यवसाय से जुडे लोगों पर ही प्रभाव नही पड़ा है बल्कि मार्केट में चाय की थड़ी, रेहड़ी वालों के अलावा दुकानदारों पर भी असर दिखाई देने लगा है। सबसे गंभीर बात तो यह है कि पत्थर उद्योग को जीवित रखने के लिए सत्ताधारी पार्टी के जनप्रतिनिधियों ने दिलचस्पी नही दिखाई है। पत्थर उद्योग के बंद होने का सबसे बड़ा प्रभाव मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है। कई घरों में चूल्हे तक नही सिलग रहे हैं। हालांकि ईआरसीसी ठेकेदार को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। गैंगसा उद्यमियों की बात करें तो दो माह से उद्योगों पर कच्चे खनिज की आमदनी बिल्कुल बंद है। अधिकांश मशीनों पर ताले लटक गए हैं। रोजगार के अभाव में मजदूर वर्ग का पलायन हो गया है, अकेले शहर में ही कई मोहल्ले हैं जो वीरान पड़े हैं।

एक तरफ सरकार लोगों को रोजगार मुहैया कराने का दावा करती हैं वहीं दूसरी तरफ रोजगार को छीनकर बेरोजगारी की तरफ ढकेल रही हैं। इसका असर बड़े कारोबारी से लेकर रेहड़ी लगाने वालो तक पड़ रहा है। हकीकत यह है कि जिन चाय की थड़ियों पर दिनभर चहल पहल होती थी वहां अब वीरानी छाई हुई है। वैसे सरमथुरा सहित ग्रामीण क्षेत्र में पत्थर खनन ही रोजगार की मुख्य धुरी हैं। जिसके बंद होने से श्रमिक वर्ग ही नहीं मध्यम वर्ग पर भी विपरीत असर पड़ने लगता है, हालांकि सरकार की मनरेगा, नि:शुल्क राशन सहित अन्य जनकल्याणकारी योजनाएं लोगों के पलायन को रोकने में विफल साबित हो रही हैं।

वनविभाग का श्रमिक वर्ग में खौफ, खदान में खनिज की तोड़फोड़ से आक्रोश:

वनविभाग के अवैध खनन का हवाला देते हुए कार्रवाई को अंजाम दिया जा रहा है जबकि वनविभाग की भूमि चिन्हित ही नहीं है। सबसे गंभीर बात यह है कि शहर में वनविभाग की कीमती जमीनों पर भूमाफियाओं ने कॉलोनिया काट दी हैं, लेकिन विभाग के अधिकारियों ने वनभूमि को बचाने की कोशिश नहीं की, जबकि खनन श्रमिकों के पसीना बहाकर मेहनत से खदान से निकाले खनिज को जप्त करने के बाद तोड़फोड़ कर नष्ट किया जा रहा है। जिसकी वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। जिसके कारण वनविभाग के अधिकारियों का लोगों में खौफ पैदा हो गया है।

-घरों में लटके ताले, आंगन में छाई खामोशी

कस्बा के सती चौक, इस्लामपुरा, भीमनगर, नई जाटव बस्ती, पदमपुरा, गढाखों, सहानीपाड़ा आदि मोहल्ले में पत्थर खनन बंद होने का सबसे अधिक असर दिखाई देने लगा हैं। इन मोहल्लों में अधिकांश घरों में ताले लटके हैं वहीं आंगन में वीरानी छाई हुई है। स्थिति यह है कि सुबह शाम जिन मौहल्लो में बच्चों की उछल कूद, आपस में लड़ाई झगड़े की आहट सुनाई देती थी वो अब पूरी तरह खामोशी में तब्दील हो चुकी है।