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चंबल में जहां घडिय़ाल का डेरा, वहीं बजरी माफिया ने डाल रखा घेरा

- मिलीभगत या भय : धौलपुर से भी गुजर रहीं बजरी से भरी सैंकड़ों ट्रॉलियां - मुरैना क्षेत्र के चंबल राजघाट पर रोज हजारों ट्रॉली रेता का अवैध खनन - लगा रखीं जेसीबी और हाइड्रा मशीनें - चंद रुपयों की खातिर पर्यावरण को नुकसान के साथ बिगाड़ रहे पारिस्थितिकी संतुलन - इंसानी लालच में जा रही संकटग्रस्त वन्यजीवों की जान

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Where the crocodile camped in Chambal, the gravel mafia laid siege

चंबल में जहां घडिय़ाल का डेरा, वहीं बजरी माफिया ने डाल रखा घेरा

चंबल में जहां घडिय़ाल का डेरा, वहीं बजरी माफिया ने डाल रखा घेरा

- मिलीभगत या भय : धौलपुर से भी गुजर रहीं बजरी से भरी सैंकड़ों ट्रॉलियां

- मुरैना क्षेत्र के चंबल राजघाट पर रोज हजारों ट्रॉली रेता का अवैध खनन

- लगा रखीं जेसीबी और हाइड्रा मशीनें

- चंद रुपयों की खातिर पर्यावरण को नुकसान के साथ बिगाड़ रहे पारिस्थितिकी संतुलन

- इंसानी लालच में जा रही संकटग्रस्त वन्यजीवों की जान

धौलपुर. प्रसिद्ध फिल्म एनएच10 का एक मशहूर डायलॉग है कि ‘इस हाइवे से उतरते ही एक अलग दुनिया है, जहां कानून का नहीं जंगल का राज चलता है।’ यह संवाद धौलपुर से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या तीन के संबंध में भी यह संवाद सटीक बैठता है। चंबल पुल को पार करते ही मध्यप्रदेश सीमा में ‘जंगल का राज’ साफ दिखाई भी देता है। यहां राजघाट पर प्रतिबंधित चंबल घडिय़ाल क्षेत्र में चंबल का सीना चीर रेता का अवैध उत्खनन जारी है। यहां एक या दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में ट्रेक्टर-ट्रॉली रेता भरकर ले जाया जा रहा है। यहां तक कि बजरी माफिया ने जेसीबी और हाइड्रा जैसी आधुनिक मशीनें भी रेता उत्खनन में लगी रखी हैं। बता दें कि चंबल नदी विलुप्तप्राय घडिय़ालों का भारत में सबसे बड़ा बसेरा है। यह संरक्षित क्षेत्र में शुमार है, इसलिए रेत उत्खनन वर्जित है। इसके बावजूद सालाना करोड़ों रुपए की रेत निकालकर वर्षों से चंबल की छाती छलनी की जा रही है। लाख सरकारी दावों के बाद भी कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सरकार भी बदलीं, लेकिन रेत की लूट जारी है। हाथ पर हाथ धरे बैठी दोनों राज्यों की पुलिसअवैध रेत के भरे ट्रेक्टर-ट्रॉली राजघाट से चंद कदम दूर मध्यप्रदेश की अल्लाबेली पुलिस चौकी और धौलपुर में सागरपाड़ा पुलिस चौकी के सामने से धड़ल्ले से गुजर रहे हैं। पुलिस की जिम्मेदारी है कि इन्हें रोक कर जब्त करे, लेकिन पुलिस जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। उसके बाद यह ट्रेक्टर मुरैना व अन्य जिलों के लिए नेशनल हाईवे से होकर निकल जाते हैं। चंबल के राजघाट पुल से खनन होने वाले लगभग 70 प्रतिशत रेत की सप्लाई राजस्थान के धौलपुर में होती है। शेष 30 प्रतिशत रेत मुरैना व ग्वालियर में खपाया जा रहा है।घडिय़ालों का है प्राकृतिक आवासवन विभाग का मानना है कि चंबल नदी में सबसे ज्यादा घडिय़ाल राजघाट पुल से भिंड तक के ऊपरी हिस्से में पाए जाते हैं। राजघाट पुल से श्योपुर तक निचले इलाके में पत्थर ज्यादा पाया जाता है। पथरीले इलाके में घडिय़ाल कम पाए जाते हैं। क्योंकि चंबल की रेता में ही ये अंडे देते हैं। ऐसे में यह इलाका ही इनका प्राकृतिक रहवास है।वन और पुलिस विभाग को नहीं दिखतेचंबल नदी के किनारे सबसे ज्यादा रेत का अवैध उत्खनन इन दिनों मध्यप्रदेश में राजघाट चंबल पुल के ऊपरी हिस्से में हो रहा है। हालात यह हैं कि रेता उत्खनन में लगी हजारों की संख्या में ट्रेक्टर-ट्रॉली और आधुनिक मशीनें राष्ट्रीय राजमार्ग तीन से ही लोगों को दिख जाती हैं। यह बात और है कि वन और पुलिस विभाग को यह सब दिखाई नहीं देता है।अधिकतर आपूर्ति धौलपुर क्षेत्र मेंमुरैना क्षेत्र में चंबल से रेता उत्खनन के बाद अधिकतर टे्रक्टर-ट्रॉलियां धौलपुर की ओर आती हैं। यह ट्रेक्टर-ट्रॉलियां आगे भरतपुर और आगरा तक जाती हैं। चंबल पुल पार करते ही धौलपुर की ओर सागरपाड़ा पुलिस चौकी है। इसके आगे आरटीओ की चेकपोस्ट है। लेकिन, इक्का-दुक्का कार्रवाइयों को छोड़ कोई बड़ी कार्रवाई दिनभर गुजरने वाली इन ट्रेक्टर-ट्रॉलियों पर नहीं की जाती।चंबल अभयारण्य की चेकपोस्ट भीइसी रास्ते पर धौलपुर में चंबल राष्ट्रीय अभयारण्य की चेकपोस्ट भी है। इसके सामने से भी अवैध रेता से भरी ट्रेक्टर-ट्रॉलियां दिनभर गुजरती है। वनकर्मियों द्वारा भी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।

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