
Knowledge of Baigas is still the highest in Vedic medicine
डिंडोरी. डिंडोरी जिला आदिवासी संस्कृति, सभ्यता, खान-पान और पारंपरिक उपचार विधि के क्षेत्र में एक विशेष पहचान रखता है। कई रिसर्च और स्टडी ने साबित भी किया है कि जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की एंटीबॉडी कैपेसिटी और इम्युनिटी अन्य सुविधाजनक स्थानों पर रहने वाले लोगों से काफी उच्च होती है। लिहाजा आज कोरोना महामारी के संकट के दौर में जनजातीय उपचार पद्धति के महत्व को जानना बहुत जरूरी है। इसी विषय पर पत्रिका ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर और जनजातीय अध्ययन के जानकार डॉ. सौरभ मिश्रा से बात की। डॉ. सौरभ ने 2015-16 में डिंडोरी के युवा सोशल वॉलेंटियर रामकृष्ण गौतम के सहयोग से जिले के चांड़ा समेत कई जनजातीय क्षेत्रों में काफी समय बिताकर डॉक्टरेट ऑफ फिलॉसोफी के लिए अध्ययन और शोध किया है। वन्या रेडियो और आदिवासियों के जीवन पर डॉ. सौरभ के कई उपयोगी लेख भी राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। गौरतलब है कि डिंडोरी के 927 गांवों में से 899 गांवों में रहने वाले बैगाओं का जीवन भी पूर्णत: वनों और वनोपज ही आधारित है। जनजातीय लोग अपने स्वजनों का उपचार आज भी जंगली जड़ी-बूटी व उपलब्ध वनोपज से ही करते हैं। यह उनके लिए कारगर भी होता है। इनका प्रकृति के साथ अद्भुत सामंजस्य ही इनके सर्वाइवल का प्रमुख कारण है। यही कारण है कि इनकी चिकित्सा विधि आज भी परंपरागत है।
लिपिबद्ध नहीं है चिकित्कीय ज्ञान
डॉ. मिश्रा ने बताया कि जनजातियों का चिकित्सीय पारंपरिक ज्ञान कहीं पर भी आपको लिपिबद्ध नहीं मिलेगी। मध्यप्रदेश समेत छत्तीसगढ़ जनजाति बहुल्य प्रदेश हैं। मध्यप्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य है। यह जनजातीय समुदायों के लिए एक अनुकूल स्थान है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां 43 जनजातियां निवास करती हैं और राज्य की कुल जनसंख्या का काफी प्रतिशत जनजातीय आबादी है। इसमें बैगा, भारिया और सहरिया को आदिम जाति समूह का दर्जा भी प्राप्त है। इन जनजातियों में परंपरागत ज्ञान अत्यंत मूल्यवान है। फिलहाल ये जनजातियां विलुप्ति की ओर अग्रसर हैं।
हडज़ोड़ से जुड़ती हैं हड्डियां
प्रदेश की जनजातियों की असाधारण परंपरागत उपचार विधियां
मध्यप्रदेश समेत डिंडोरी-मंडला जिले की जनजातियों की उपचार पद्धतियां असाधारण हैं। जैसे हड्डी जोडऩे व घाव भरने की उपचार विधि। हड्डी टूटने पर हडज़ुड़ी की पत्तियों को पीसकर उस स्थान पर बांध देते हैं, जहां से हड्डी टूटी है। यह विधि हड्डी को जोडऩे में सहायक सिद्ध होती है। इसी प्रकार शरीर का कोई अंग कट जाने पर कुरकुट के पत्ते का हल्दी के साथ लेप मिलाकर लगाते हैं। इससे देखते ही देखते अप्रत्याशित रूप से घाव भर जाता है। यह पद्धति गहरे से गहरे घावों पर भी कारगर साबित होती है।
पेट व मूत्र संबंधी समस्याओं का होता है निदान
जनजातीय समाज वनों, जंगलों या दूरवर्ती इलाकों में निवास करता है, जहां पेयजल आदि की समस्या भी बनी रहती है। इसलिए अक्सर इन्हें पेट या मूत्र संबंधी समस्याएं होने की आशंका बनी रहती है। इससे बचने के लिए वनवासी समाज जरीया पौधे की पत्तियों और वनअंडी के पौधें की जड़ों का उपयोग करते हैं। वनों में निवास करने वाली जनजातीय समूहों को भी सर्पदंश का सामना करना पड़ता है, इसलिए पीढिय़ों से चली आ रही उपचार क्रिया को आज भी अपनाए हुए हैं।
सर्पदंश का कम हो जाता है असर
बैगा समाज के लोग सर्पदंश की स्थिति में इंद्रावन पौधे की जड़ को पीसकर और करौंदे की जड़ को उबालकर मरीज को पिला देते हैं। इससे दंश का असर कम या खत्म हो जाता है। सर्पदंश के लिए अलग-अलग जनजातीय समुदायों में अलग.अलग उपचार पद्धतियां प्रचलित हैं। मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी के उपचार के लिए आदिवासी पीपल और पलारा का दातून करते हें। इनसे निकलने वाले रस से मलेरिया का असर इन पर नहीं होता। ऐसे कई उदाहरण और शोध प्रमाणित करते हैं कि बैगा समुदायों को वनौषधियों का अद्भुत ज्ञान है।
Published on:
30 May 2020 09:01 am
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