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डिंडोरी. खरीफ के मौसम में पानी कम गिरने से जहां किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर रहीं हैं वहीं डिंडोरी कृशि विज्ञान केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. ओपी दुबे ने मोटे अनाज में सांवा की सबसे उन्नत किस्म ईजाद की है यह सांवा सामान्य घास से संकरण कर बनाई गई है और दशकों की मेहनत के बाद यह उपज विकसित हो पाई है। अल्पवर्षा की स्थिति में भी संावा का उत्पादन धान व अन्य खरीफ फसलों के मुकाबले काफी अच्छा है वैसे सांवा के उत्पादन के लिये अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है और इस उपज की एक और खासियत यह है कि अनुपजाऊ भूमि में भी इसका उत्पादन काफी अच्छा होता है।
उपज का हर भाग है उपयोगी
सांवा उपज जहां पौष्टिक, सुगर फ्री है वहीं पौष्टिकता में भी इसमें कोई कमी नहीं है, सांवा में कार्बोहाइड्रेट, रेशा, आयरन, कैल्शियम, विटामिन्स, थायमिन के साथ ही बी काम्प्लेक्स मौजूद है। शक्कर की बीमारी वाले रोगियों के लिये जहां सांवा काफी उपयोगी है वहीं हृदय रोग से पीडित रोगियों के लिये भी यह आदर्श आहार है इसके साथ ही इस उपज में आयरन, कैल्शियम तत्व होने के कारण महिलाओं के लिये तो यह काफी उपयोगी है खासकर गर्भवती महिलाओं के लिये। एक ओर जहां आम इंसानों के लिये अनाज जहां सर्वगुण संपन्न है वहीं पशु आहार के रूप में इसका तना काफी उपयोगी है पशुओं के लिये यह काफी पौष्टिक होता है।
बारिश की कमी के बाद भी सांवा का उत्पादन जहां अनुपजाउ भूमि में हो जाता है वहीं काली मिट्टी के क्षेत्र में तो इसकी उपज दोगुनी से भी अधिक होती है। सांवा की पहले की प्रजातियां जहां प्रति एकड 50 से 60 किग्रा उपज देती थीं वहीं अब यह उत्पादन लगभग दस गुना हो गया है। सामान्य प्रजाति की घास से ईजाद यह उन्नत प्रजाति एक एकड में 6 क्विंटल तक उत्पादन देता है जो धान से काफी अधिक है। सांवा के साथ ही किसान अपने खेतों में कोदो, कुटकी, मडिया, काकुन जैसी फसलें ले सकते हैं ये सभी मोटे अनाज हैं और धान के मुकाबले इनकी उपज तो अधिक है ही इसके साथ ही इनकी दरें भी काफी अधिक हैं। महाराष्ट्र के नासिक जैसी मण्डी में सांवा का मूल्य 2 हजार 5 सौ रूपये प्रति क्विंटल से अधिक मिलता है वहीं कोदो कुटकी का मूल्य भी तीन हजार रूप्ये क्विंटल तक जाता है।
जिले में मोटे अनाजों का रकवा काफी कम है इस साल यहां पर मात्र 22 हजार हेक्टेयर में ही मोटे अनाजों का उत्पादन हो रहा है जो कुल कृषि रकवे का काफी कम हिस्सा है और इस क्षेत्रफल में लगातार कमी दर्ज की जा रही है जो अच्छे संकेत नहीं हैं। मोटे अनाज जहां मुख्य फसल में शुमार होते थे वहीं अब इस इलाके में यह लुप्तप्राय हो रहे हैं।
कभी भी आदिवासी इलाके कुपोषण की समस्या से ग्रस्त नहीं थे खासकर यहां रहने वाली जनजातियां हमेशा हष्टपुष्ट मानी जाती थीं लेकिन पिछले कुछ सालों में यहां कुपोषण भी एक विकराल समस्या के रूप में सामने आया है। इस कुपोषण के पीछे मुख्य वजह भी खान पान की आदतों में बदलाव है और यह बदलाव आया खेती में बदलाव की वजह से मोटे अनाजों व यहां की पारंपरिक उपज में वह सभी गुण मौजूद होते थे जो कुपोषण से मुक्त रखते थे लेकिन लगातार उपज का रकवा कम होना यहां कुपोषण में बढोत्तरी का कारण माना जा सकता है।
Published on:
22 Sept 2017 12:09 pm
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