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अधिक उम्र में भी हो सकता है घुटने या कमर में रिप्लेसमेंट

आर टु आर तकनीक का अर्थ है रिप्लेसमेंट टु रिसर्फे सिंग। इसमें सामान्य जॉइंट रिप्लेसमेंट की तरह पूरी हड्डी को काटकर निकालनेके बजाय हड्डी के केवल खराब हिस्से को छीलकर वहां घुटने में इम्प्लांट जबकि हिप रिप्लेसमेंट में कैप लगा दिया जाता है।

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जयपुर

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Jyoti Kumar

Aug 22, 2023

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आर टु आर तकनीक का अर्थ है रिप्लेसमेंट टु रिसर्फे सिंग। इसमें सामान्य जॉइंट रिप्लेसमेंट की तरह पूरी हड्डी को काटकर निकालनेके बजाय हड्डी के केवल खराब हिस्से को छीलकर वहां घुटने में इम्प्लांट जबकि हिप रिप्लेसमेंट में कैप लगा दिया जाता है।

केस स्टडी : 97 की उम्र में भी हो चुकी घुटने की सर्जरी

हाल ही एक ऐसे बुजुर्ग मरीज के घुटने की सर्जरी की गई, जिनकी उम्र 97 वर्ष थी। उन्हें कई तरह की दूसरी परेशानियां भी थी, लेकिन वह चाहते थे कि घुटने की परेशानी खत्म हो जाए। उनका हीमोग्लोबिन यानी शरीर में खून की मात्रा भी कम थी, लेकिन इस सर्जरी में खून का रिसाव कम होता है। ऐसे में उनकी सर्जरी आर टु आर तकनीक से की गई। सर्जरी के तीन दिन बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं। उनके घुटनों में किसी तरह की तकलीफ नहीं है।

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कोई बीमारी है तो राहत पाया जा सकता है

पहले रिप्लेसमेंट सर्जरी में मरीज को कैथेटर लगाते थे ताकि यूरिन निकलने में दिक्कत न हो। इसी तरह किसी रोग से ग्रस्त होने पर सर्जरी करने से बचते थे। कई बार अधिक रक्तस्राव से दूसरी समस्याएं हो जाती थीं। इसी तरह डायबिटीज रोगियों में भी ऐसी सर्जरी करने से बचते थे, लेकिन नई तकनीक से संभव है।

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छोटे चीरे से होती सर्जरी, ब्लड कम निकलता है

आर टु आर तकनीक में हड्डियों को काटा नहीं जाता, बल्कि उसे हल्का छीलकर उस पर ही इम्प्लांट कर दिया जाता है जिससे ब्लड लॉस कम होता है। इसमें बहुत छोटे चीरे की जरूरत पड़ती है। इसलिए जिनमें खून की कमी है, वे भी यह सर्जरी आसानी से करवा सकते हैं। इसमें गंभीर समस्या होने की आशंकाएं कम होती हैं।

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आर टु आर तकनीक के अन्य फायदे

सामान्य जॉइंट रिप्लेसमेंट में 40-50 मिनट लगते हैं जबकि आर टु आर में 15-17 मिनट का समय लगता है। मरीज को कम समय ओटी में रहना होता है।
इसमें बहुत छोटा चीरा लगाया जाता व खून का दौरा भी नहीं रोकना पड़ता है।
कमर की सर्जरी में ट्यूब से बेहोशी देने की जरूरत नहीं पड़ती है।
इसमें यूरिन की नली लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है। मरीज 3 घंटे में अपने पैरों पर चलने लगता है।
बिना दिक्कत दोनों घुटनों की सर्जरी एक साथ करवा सकते हैं। यह तकनीक रोबोट की तरह काम करती है।
इसमें हड्डी के ऊपरी हिस्से को ही छीला जाता है। अंदर के सॉफ्ट हिस्से को नहीं छेड़ा जाता है। इसलिए इम्प्लांट की उम्र भी अधिक हो जाती है। भविष्य में संक्रमण की आशंका नहीं रहती है।

डिसक्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह किसी क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प नहीं है। इसलिए पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।