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इन कारणों से कम होने लगती है आंखों की रौशनी

आंखों में दबाव बढ़ने से ऑप्टिक नस पर दबाव पड़ता है और यह सूखने लगती है धीरे-धीरे दिखना बंद हो जाता है जिसे विज्ञान की भाषा में ऑप्टिक एट्रॉफी कहते हैं।

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जयपुर

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Vikas Gupta

May 05, 2019

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आंखों में दबाव बढ़ने से ऑप्टिक नस पर दबाव पड़ता है और यह सूखने लगती है धीरे-धीरे दिखना बंद हो जाता है जिसे विज्ञान की भाषा में ऑप्टिक एट्रॉफी कहते हैं।

भारत में नेत्रहीनता की प्रमुख वजहों में काला मोतिया या ग्लूकोमा भी एक है, इसे आंखों में कालापानी की समस्या भी कहते हैं। आंखों में दबाव बढ़ने से ऑप्टिक नस पर दबाव पड़ता है और यह सूखने लगती है धीरे-धीरे दिखना बंद हो जाता है जिसे विज्ञान की भाषा में ऑप्टिक एट्रॉफी कहते हैं।

इसके तीन प्रकार होते हैं -
प्राइमरी की परेशानी -
एक्यूट ग्लूकोमा : इसमें आंखों व सिर में अधिक दर्द, लालिमा, उल्टी होना, धुंधलापन और दिखाई न देने जैसी परेशानियां होती हैं। क्रॉनिक सिंपल ग्लूकोमा : इसमें व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि वह इस समस्या से पीड़ित है। मरीज को दर्द व किसी प्रकार की परेशानी नहींं होती। कुछ मामलों में चश्मे का नंबर बार-बार बदलना भी इसके लक्षण माने जाते हैं।
तीसरे में तकलीफ -
कॉन्जिनाइटल ग्लूकोमा इस रोग का तीसरा प्रकार है जो विशेषतौर पर बच्चों को होता है। यह समस्या 10 हजार बच्चों में से किसी एक में पाई जाती है। बच्चों में इसकी वजह आनुवांशिक होती है जिससे उन्हें आंखों से पानी, लालिमा, आंखों का आकार बड़ा होना और कॉर्निया का धुंधला होने जैसी परेशानियां हो सकती हैं।

सेकेंडरी में समस्या -
किसी प्रकार की चोट लगने और मोतियाबिंद पककर फूटने से भी मरीज सेकेंडरी ग्लूकोमा से प्रभावित हो सकता है।

मुख्य लक्षण -
यह रोग हमारी एक या दोनों आंखों को प्रभावित कर सकता है। सामान्य रूप से मरीज में दिखने का घेरा कम होने जैसी समस्या हो सकती है। धीरे-धीरे उसकी दृष्टि का विस्तार कम होने लगता है और मरीज को एक ट्यूब में देखने जैसा प्रतीत होने लगता है। अंत में उसकी आंखों की रोशनी बिल्कुल शून्य हो जाती है यानी उसे दिखना बिल्कुल बंद हो जाता है।

इन्हें खतरा -
ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता को यह समस्या रही हो उन्हें आनुवांशिक रूप से यह रोग हो सकता है। इसके अलावा डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, मायोपिया (दूर का साफ न देख पाना), हाइपरमेट्रोपिया और 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को ग्लूकोमा का खतरा रहता है। इसकी पहचान के लिए इंट्रा ऑक्यूलर प्रेशर (आईओपी) की जाती है।

जांच व उपचार -
प्रमुख जांचें
ग्लूकोमा की पहचान के लिए इंट्रा ऑक्यूलर प्रेशर, आंख के पर्दे की जांच, पेरीमेट्री व अन्य जांचें की जाती हैं।
इलाज -
ग्लूकोमा का उपचार रोग की स्थिति और स्टेज पर आधारित होता है। कॉन्जिनाइटल ग्लूकोमा का केवल सर्जरी से ही इलाज संभव है। इसके अलावा बड़े व्यक्तियों में एक्यूट ग्लूकोमा के दौरान नसों में होने वाली रुकावट को दूर करने के लिए ट्रेबीक्यूलोप्लास्टी, लेजर सर्जरी या ट्रेबीकुलेक्टॉमी ऑपरेशन किया जाता है। साथ ही क्रॉनिक ग्लूकोमा के लिए दवाओं के अलावा ट्रेबीक्यूलोप्लास्टी ऑपरेशन भी किया जाता है।
न्यू ट्रीटमेंट -
वर्तमान में प्रयोग हो रहे ट्रीटमेंट के दौरान ग्लूकोमा वॉल्व को प्रत्यारोपित किया जाता है। साथ ही न्यूरो प्रोटेक्टिव दवाएं भी इस रोग के इलाज में जल्दी असर करने वाली साबित हो रही हैं।