
विश्व के कई स्वास्थ्य संगठनों के प्रयासों के बावजूद टीबी पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगा हैं। हाल के वर्षों में टीबी अधिक विकराल रूप में सामने आई है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में दुनियाभर में 1 करोड़ 4 लाख नए टीबी के रोगी सामने आए। एशिया के देशों में यह भयावह स्थिति में है जो कि टीबी के कुल रोगियों का 60 प्रतिशत हिस्सा है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंताजनक बात है 480000 नए एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस) रोगी। एमडीआर टीबी का मतलब होता है ऐसा टीबी का रोगी जिस पर टीबी की सभी दवाएं बेअसर होती हैं।
एमडीआर टीबी
एमडीआर टीबी वाले जीवाणु या बैक्टीरिया जब किसी अन्य व्यक्ति को संक्रमित करते हैं तो वह व्यक्ति भी एमडीआर टीबी का रोगी कहलाएगा और उस पर भी कोई दवा असर नहीं करेगी। क्योंकि टीबी हवा या सांस के माध्यम से भी फैलती है, इसलिए इसका दायरा काफी बड़ा है या यह कहें कि इसका दायरा पूरा विश्व है और इसी वजह से कहा जाता है कि एमडीआर टीबी पूरे विश्व के लिए खतरे की घंटी है।
हम खतरे के मुंहाने पर हैं और इससे बचना ही हमारे पास एक मात्र विकल्प है। हमें इस समस्या से बचने के लिए आगे बताई जा रही बातों का ध्यान रखना होगा।
आयुर्वेद की दवाओं के द्वारा भी टीबी की चिकित्सा की जा सकती है। इसके लिए सरपूंखा की पत्तियां, मधुमक्खी के छत्ते, अभ्रक भस्म, नीम की छाल, अडूसा अर्क आदि जड़ी बूटियों का प्रभावी रूप से प्रयोग किया जा सकता है। सही जीवनचर्या आम लोगों को सिखाना जरूरी है। सही तरीके से सांस लेना, भोजन, पानी और नींद का ज्ञान उन्हें होना चाहिए।
आयुर्वेद का सिद्धान्त है कि रोगाणु का शरीर पर आक्रमण और रोग फैलाने की पूरी प्रक्रिया क्षेत्र और बीज सिद्धांत पर आधारित है। क्षेत्र अर्थात् शरीर जितना शक्तिशाली होगा बीज या रोगाणु उस पर उतने बेअसर होंगे और क्षेत्र जितना कमजोर यानी उपजाऊ होगा उस पर बीज उतनी तेजी से उग आएंगे। तो हमें हमारे शरीर को शक्तिशाली बनाना है ताकि उन पर टीबी क्या कोई और बैक्टीरिया या वायरस भी असर ही न कर पाएं।
सूर्य की किरणों में बैक्टीरिया रोधी गुण होते है, अत: सनबाथ (सूर्य स्नान) के लिए लोगों को प्रेरित करें। घर में भी सूर्य ? की रोशनी का प्रवेश होना चाहिए ताकि बैक्टीरिया पनप न पाएं।
इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आयुर्वेद की दवाओं का उपयोग किया जा सकता है जैसे-च्यवनप्राश, धात्रीलोह, आमलकी रसायन, योगेन्द्र रस आदि।
घरों में पर्याप्त मात्रा में हवा का प्रवेश और निकास हो ताकि रुकी हुई हवा में बार-बार सांस लेने से शरीर कमजोर न हो तथा ऐसा करने से संक्रमण का जोखिम भी कम हो जाता है।
रोगियों को समझाएं कि टीबी को नष्ट किए बिना इलाज को बीच में अधूरा न छोड़ें ........ ऐसा करके वे पूरी इंसानियत को एक भयावह खतरे से बचा सकते हैं।
Published on:
24 Mar 2018 05:16 am
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