
नाथद्वारा के श्रीनाथजी ने कभी डूंगरपुर में भी किया था विश्राम
मिलन शर्मा
डूंगरपुर. प्रदेश ही नहीं देश और विदेश में ख्याति प्राप्त नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर किसी भी प्रसिद्धि का मोहताज नहीं है। हीरे जडि़त विमोहिनी प्रतिमा के दर्शन के लिए वर्ष पर्यन्त वहां मेले लगे रहते हैं। आस्था के चलते उनके करोड़ों-करोड़ों भक्त देश और विदेश में नियमित उनकी साधना में लीन रहते हैं। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि नाथद्वारा से पूर्व यहीं श्रीनाथजी की प्रतिमा डूंगरपुर आई थी। एक दो दिन नहीं कई दिनों तक श्रीनाथजी शहर की सीमा में रथ में विराजित रहे और इसके बाद यहां से मेवाड़ राज्य में प्रवेश किया। राज्यादेश के बाद वहां प्रतिमा विराजित की। आध्यात्मिक इतिहास के पन्नों में छूपी यह जानकारी बहुत कम लोग जानते हैं। पर, हां पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय से जुड़े भक्त जरूर डूंगरपुर को भी समय-समय पर इतना ही महत्व देते आए हैं।
ब्रज से विहार कर यहां पहुंची थी प्रतिमा
प्रभु श्रीजी का प्राकट्य ब्रज के गोवर्धन पर्वत पर जतिपुरा गांव के निकट हुआ था। महाप्रभु वल्लाभाचार्यजी ने वहीं मंदिर निर्माण कर श्रीजी की सेवा-अर्चना शुरू की। लेकिन, मुगल शासक औरंगजेब अत्यंत असहिष्णु एवं हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को तोडऩे वाला शासक हुआ। मूर्तिपूजा का घोर विरोधी औरंगजेब की कुदृष्ट्रि ब्रज में विराजित श्रीनाथजी पर भी पडऩे की संभावना थी। ऐसे में ब्रजजनों के आराध्य श्रीनाथजी के विग्रह को सुरक्षा की बात उठी।
ऐसे में महाप्रभु श्रीवल्लाभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथजी के पौत्र दामोदरलाल एवं उनके काका गोविंद, बालकृष्ण एवं वल्लभ समस्त अपनी धन-संपदा आदि सभी को वहीं छोड़ कर विक्रम संवत 1726 आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (ई. सन् 1699 दिनांक 19 सितम्बर) बुधवार को रात्रि में श्रीनाथजी के विग्रह को रथ में लेकर सुरक्षित स्थान की तलाश में निकल पड़े। मार्ग में भक्ति करते हुए चलते रहे।
शरण लेने की आस रही निराश
वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र उपाध्याय बताते है कि डूंगरपुर की पवित्र गेपसागर की पाल और श्रीनाथजी मंदिर कई ऐतिहासिक एवं धार्मिक घटनाओं को अपने गर्भ में संजोये हुए हैं। आज से लगभग 590 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् 1485 ईस्वी 1427 में गेपा रावल द्वारा निर्मित गेपसागर जलाशय एवं उसकी यह पाल वह स्थान है, जहां 350 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् 1726 ईस्वी 1669 में नाथद्वारा जाने के पूर्व श्रीनाथजी की सवारी के साथ उनका रथ शरण लेने के उद्देश्य से उनके भक्तजनों का समूह के साथ कई दिनों तक गेपसागर की पाल पर रूका था। यहां उनकी नियमित पूजा-अर्चना होती रही। वरिष्ठ इतिहासकार महेश पुरोहित ने भी अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि मुगल बादशाह औरंगजेब के भय से गोस्वामी विट्ठलनाथजी के पौत्र आदि प्रतिमा लेकर निकले। दामोदरदास अन्य स्थानों पर होते हुए डूंगरपुर पहुंचे। यहां गेपसागर जलाशय की पाल पर ठहरे। श्रीनाथजी रथ में ही विराजित रहे। उस समय डूंगरपुर के महारावल जसवंत सिंह प्रथम तीर्थयात्रा पर गए हुए थे। अत: स्थानीय अधिकारियों ने श्रीनाथजी को डूंगरपुर में ही प्रतिष्ठित करवाने का साहस नहीं दिखाया। इस पर दो वर्ष चार मास और सात दिन के देश भ्रमण के बाद अंतत विक्रम संवत 1728 फाल्गुन कृष्णा सात शनिवार के दिन नाथद्वारा में श्रीनाथजी के विग्रह की प्रतिष्ठा
की हुई।
इसीलिए डूंगरपुर को देते हैं महत्वउपाध्याय बताते है कि यही कारण है ऐतिहासिक एवं धार्मिक जानकारी रखने वाले वल्लभ सम्प्रदाय के श्रीनाथजी के भक्त नाथद्वारा दर्शनाथ जाने के साथ-साथ उन सभी स्थानों को भी महत्व देते हैं, जहां उनके विग्रह ने विश्राम किया था। इसमें डूंगरपुर भी एक प्रमुख स्थान माना है। गेपासागर की पाल पर स्थित विशाल गोवद्र्धननाथ मंदिर, जिन्हे वर्तमान में श्रीनाथजी का मंदिर के नाम से जाना जाता है। वहां भी दर्शन लाभ लेते हैं। पर्वतों के बीच स्थित जलाशय के किनारे बना यह विशाल मंदिर अपनी भव्यता एवं वास्तु शिल्प की अद्भुत कला के कारण दर्शनार्थियों के लिए सदियों से आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। महाप्रभु वल्लभाचार्यजी की चौथी पीढी के गोस्वामी श्रीगोपाललालजी के पुत्र गोस्वामी गोपेन्द्रलालजी डूंगरपुर के रंग महल (मणि निवास) में निवासरत रहे। उन्होंने डूंगरपुर नगर की भूमि को वृंदावन, गेपसागर जलाशय को यमुना स्वरूप तथा आस-पास की पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित कलेश्वर मगरा को गिरिराज पर्वत, फौज का बडला स्थित बरगद के वृक्ष को वंशीवट मानते हुए इस जलाशय की पाल को पवित्र स्थान दर्शाया था।
Published on:
19 Aug 2022 11:06 am
बड़ी खबरें
View Allडूंगरपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
