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पुष्टिमार्गीय गोस्वामी गोपेंद्रलाल ने डूंगरपुर में स्थापित की थी ‘चित्रसेवा’

डूंगरपुर. वैसे तो डूंगरपुर में शैव व देवी मंदिरों की अधिकता है, लेकिन लीलावतारी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भी अंचल में श्रद्धा और आस्था समान भाव से हिलोरे लेती है। यही वजह है कि डूंगरपुर में जहां भारत की सबसे बड़ी गोवद्र्धननाथ (श्रीनाथजी) प्रतिमा विराजित है तो बेणेश्वर का राधाकृष्ण मंदिर भी जगत् प्रसिद्ध है।

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पुष्टिमार्गीय गोस्वामी गोपेंद्रलाल ने डूंगरपुर में स्थापित की थी ‘चित्रसेवा’

पुष्टिमार्गीय गोस्वामी गोपेंद्रलाल ने डूंगरपुर में स्थापित की थी ‘चित्रसेवा’

पुष्टिमार्गीय गोस्वामी गोपेंद्रलाल ने डूंगरपुर में स्थापित की थी ‘चित्रसेवा’
विनय सोमपुरा
डूंगरपुर. वैसे तो डूंगरपुर में शैव व देवी मंदिरों की अधिकता है, लेकिन लीलावतारी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भी अंचल में श्रद्धा और आस्था समान भाव से हिलोरे लेती है। यही वजह है कि डूंगरपुर में जहां भारत की सबसे बड़ी गोवद्र्धननाथ (श्रीनाथजी) प्रतिमा विराजित है तो बेणेश्वर का राधाकृष्ण मंदिर भी जगत् प्रसिद्ध है। इतना ही नहीं पुष्टिगार्मीय वल्लभ संप्रदाय का भी डूंगरपुर से सदियों पुराना संबंध है। संप्रदाय की ही उपशाखा जय श्री गोपाल के आद्य पीठाधीश्वर गोस्वामी गोपाललाल के पुत्र गोस्वामी गोपेंद्रनाथ लगभग एक दशक तक डूंगरपुर में रहे और यहां जुना महल में चित्रसेवा स्थापित की। उनकी पुत्री यमुनादेवी (जमुनेश महाप्रभु) को यहीं पर उत्तराधिकारी घोषित कर उन्हें तिलकायत बनाया गया। संप्रदाय से जुड़े अनुयायियों का आज भी डूंगरपुर से जुड़ाव है तथा समय-समय पर आकर उन स्थलों को नमन करते हैं जहां गोस्वामी गोपेंद्रनाथ और जमुनेश महाप्रभु का वास रहा।
महारावल ने बनवाया था मणि-महल
इतिहासकार स्व डा. महेश पुरोहित ने अपनी पुस्तक ‘जय गोपाल, पुष्टिमार्ग और डूंगरपुर’ में पुष्टिमार्ग के डूंगरपुर से संबंध और उसके यहां प्रवास का संपूर्ण विवरण उल्लेखित किया है। कि वल्लभ संप्रदाय के वंशज गोस्वामी गोपाललाल ने वि.सं. 1692 में भावनगर के उखरवा में अपने अनुयायियों की उपस्थिति में अपनी अलग सृष्टि की रचना की। बाद में यह जय श्री गोपाल नामक उपशाखा के रूप में सौराष्ट्र में प्रचलित हुई। आगे चल कर उनके पुत्र गोस्वामी गोपेंद्रलाल कार्य क्षेत्र का विस्तार व मत का प्रचार करते हुए डूंगरपुर आए। तत्कालीन महारावल जसवंतसिंह प्रथम से मिले। महारावल उनसे प्रभावित हुए और डूंगरपुर में ही रहकर काम करने का आग्रह किया। साथ ही उनके लिए जुना महल परिसर में ही अपने महल के पास मणि-महल बनवाया। गोस्वामी वहां विराजते और महारावल अपने महल से उनका दर्शन करते। विक्रम संवत् 1721 में मणि महल में बैठक स्थापित कर गोस्वामी गोपाललाल की चित्रसेवा विराजमान की। गिरीपुर को गोकुल, कलेश्वर मगरे को गिरीराज गोवद्र्धन मानते हुए गिरिराज परिक्रमा के रूप में वन यात्रा शुरू की। यह आज भी देवशयनी एकादशी पर निकाली जाती है। गोपेंद्रलाल वि.सं. 1732 तक डूंगरपुर में रहे। इस दौरान उन्होंने यहां जांबुवती बहूजी से विवाह भी किया।
हजारों किमी दूर से आते हैं अनुयायी
संप्रदाय से जुड़े अनुयायी आज भी हजारों किमी दूर से डूंगरपुर आते हैं। मणि महल में गादी स्थल के दर्शन करते हैं। गोस्वामी गोपेंद्रलाल की ओर से स्थापित चित्रसेवा को इतिहासकार ने महल के सेवा कक्ष से खोजा। महारावल महिपालसिंह ने उसे गेपसागर की पाल स्थित श्रीनाथजी मंदिर में दर्शनार्थ रखवाया है। जमुनेश महाप्रभु के प्रस्थान के बाद समय-समय पर सौराष्ट्र से अनुयायियों के संघों का आगमन होता रहा। वे मणि महल के साथ-साथ घाटी स्थित रामबाव में बैठ कर संकीर्तन करते थे। इसके बाद लंबे समय से बड़े संघों का आगमन नहीं हुआ। कुछ लोगों के आने का क्रम जारी था, लेकिन उन्हें यहां कोई जानकारी नही मिल पाती थी। इस पर इतिहासकार ने उनके डूंगरपुर से संबंध आदि की खोज की। जनवरी 2005 में सौराष्ट्र से आए संघ ने डूंगरपुर में भव्य ध्वजबंध महोत्सव आयोजित किया। इसके बाद गत 21 व 22 सितम्बर 2018 को भी संघ ने यहां आकर विविध धार्मिक अनुष्ठान किए थे।
नारी उत्तराधिकारी का प्रशस्त किया मार्ग
इतिहासकार स्व .डा. पुरोहित ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि उस दौर में जब महिलाओं के लिए कई तरह की पाबंदियां थी। उस दौर में डूंगरपुर ने नारी उत्तराधिकारी का मार्ग प्रशस्त किया था। गोपेंद्रलाल के दो पुत्र गोपाल और जयदेव और दो पुत्रियां सत्यभामा और यमुना थी। दोनों पुत्रों ने पिता के जीवनकाल में ही लीला विस्तारी (स्वर्गवास) थी। गोस्वामी छोटी बेटी यमुना को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। उन्होंने अपनी यह इच्छा महारावल जससंतसिंह के सक्षम भी व्यक्त की। साथ ही इसका संकेत अपने कवि-सेवक उपलेटा के कृष्णदास भट्ट को भी दिया। उस समय यमुना महज छह साल की थी और अपनी मां के साथ गोकुल में रह रही थी। गोपेंद्रलाल की तिरोधान लीला (देवलोकगमन) के बाद बड़ी बेटी सत्यभामा डूंगरपुर आई और महारावल से पिता की गादी पर बिठाने को कहा। महारावल से सौराष्ट्र के वैष्णवों से चर्चा के बाद निर्णय की बात कही। उस समय पुरुष वंशज को गादी पर बिठाने का मत भी आया, लेकिन महारावल ने नारी उत्तराधिकारी का मार्ग खुला रखकर साहसिक, प्रगतिशील और क्रांतिकारी कदम उठाया। इसके बाद कवि कृष्णदास भट्ट ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा कर दी कि यमुना बेटी ही गादी पर बैठेंगी। इस पर सत्यभामा को बूरा लगा और वे पिता के काम को आगे बढ़ाने के लिए सौराष्ट्र के राजनगर चली गई। यमुना बेटी के वयस्क होने तक अनुयायियों ने राम और भरत प्रसंग की तर्ज पर काम काज संभाला और विक्रम संवत् 1741 को जमुनेश प्रभु अर्थात् यमुना को डूंगरपुर आमंत्रित कर तिलकायत घोषित कर गादी पर विराजमान किया। जमुनेश महाप्रभु वि.सं. 1787 तक डूंगरपुर रहे और इसके बाद नाथद्वारा जाकर श्रीनाथजी की सेवा में रत रही। वहीं फाल्गुन शुक्ल षष्ठी वि.सं. 1787 को उन्होंने लीला-विस्तार किया।