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महंगा सौदा, सस्ती “वाहवाही”

सरकार के पैसों से कैसे वाहवाही लूटी जाए, वह कोई कृषि अधिकारियों से सीखे। जी हां...। फलोज के कृषि विज्ञान केन्द्र में जेट्रोफा से फ्यूल बनाने के लिए लगाया

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Kamal Singh Rajpoot

Jun 27, 2015

Dungarpur

Dungarpur

डूंगरपुर। सरकार के पैसों से कैसे वाहवाही
लूटी जाए, वह कोई कृषि अधिकारियों से सीखे। जी हां...। फलोज के कृषि विज्ञान
केन्द्र में जेट्रोफा से फ्यूल बनाने के लिए लगाया बायोडीजल प्लान्ट नौ साल से
कबाड़ में हैं। सालों से धूल फांक रही साढ़े सात लाख रूपए की मशीन किसी काम नहीं आ
रही है। वर्तमान अधिकारी इसे महंगा सौदा बता रहे हैं, तो उस समय अपनी उपलब्घि
दिखाने के लिए आनन-फानन में लगवाया संयंत्र सरकारी राजस्व को चूना लगाता ही साबित
हुआ है।

उद्घाटन, फिर लगाया ताला : इस संयत्र की शुरूआत वर्ष 2006 में
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर के माध्यम से की गई थी।
बायो डीजल संयत्र की शुरूआत राजस्थान आजीविका मिशन के तत्कालीन उपाध्यक्ष मीठालाल
मेहता, तत्कालीन कुलपति शांतिलाल मेहता और तत्कालीन कलक्टर मंजू राजपाल की मौजूदगी
में की गई थी। उस समय मुख्य वैज्ञानिक बीएस भीमावत थे। कुछ कृषि वैज्ञानिक बताते है
कि उद्घाटन के समय जरूर कुछ फ्यूल बनाया था।

अलग से बनाया परकोटा :संयत्र
को स्थापित करने के लिए बकायदा केन्द्र के अंदरूनी हिस्से में परकोटा निर्माण कर
गेट लगाया था। केवल एक ही दिन इस मशीन से थोड़ा सा ईधन बनाया था, इसके बाद संयंत्र
के गेट पर ताला लग गया, जो आज तक नहीं खुला। 13 दिसम्बर 2006 में संयत्र का उद्घाटन
हुआ था।

अधूरा रहा उद्देश्य: जेट्रोफा को स्थानीय भाषा में रतनजोत कहा जाता
है। रतनजोत के बीजों से ईधन निर्माण की शुरूआत की जानी थी। इस संयत्र को स्थापित
करने के पीछे उद्देश्य था कि वागड़ क्षेत्र में होने वाली रतनजोत से फ्यूल तैयार कर
लाभ लिया जाए। लेकिन जब संयंत्र लगाया तो शायद प्रोजेक्ट पर पूरी तरह से काम नहीं
हो पाया था।

इनका कहना है
इससे डीजल बनाना आर्थिक रूप से मंहगा होता है,
इसलिए ये मशीन पूरी तरह से फेल है। फिलहाल इसे शुरू करना संभव नहीं है।
डा.
एसएन ओझा, मुख्य वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केन्द्र, फलौज

भुवनेश पण्ड्या