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पवित्र सोच ही विकास पथ पर अग्रसर करती है- आचार्य श्रीविशुद्ध सागर

प्रख्यात दिगंबर संत 108 श्री विशुद्ध सागर महाराज (Acharya Vishuddhasagar) ने पत्रिका के पाठकों के लिए यह लेख लिखा है। उन्होंने आनंदित जीवन जीने की कला के बारे में बताया है। आचार्यश्री ससंघ दुर्ग में विराजमान हैं। आचार्य ने कहा सुखद जीवन के लिए सर्वप्रथम सोच का सम्यक होना अनिवार्य है। जिसका चिंतन समीचीन होगा वह उपसर्ग में भी उत्कर्ष प्राप्त कर लेता है।

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श्रेष्ठ मनुष्य भाषण, व्यापार, धर्म आध्यात्म आदि 72 कलाओं का ज्ञाता होता है। आनंदित जीवन जीना भी एक कला है। जो जीवन की कला सीख लेता है, वह कष्टों में भी कल्याण का रास्ता खोज लेता है। सुखद जीवन के लिए सर्वप्रथम सोच का सम्यक होना अनिवार्य है। जिसका चिंतन समीचीन होगा वह उपसर्ग में भी उत्कर्ष प्राप्त कर लेता है। पवित्र सोच ही विकास पथ पर अग्रसर करती है। सोच जैसी होगी वैसा ही जीवन होता है। सम्यक सोच शांति का द्वार है और विपरीत सोच अवनति, कष्ट, अशांति व दुख का कारण है।

शिक्षित होना आवश्यक -
लौकिक जिंदगी जीने के लिए शिक्षित होना आवश्यक है। आय अधिक, व्यय कम ये आर्थिक सिद्धांत है। प्राणायाम, व्यायाम, पौष्टिक भोजन, चिंतन-मनन, समय पर विश्राम, चिंतामुक्त जीवन स्वस्थता का मूलमंत्र है।

हानि-लाभ पर विचार जरूरी
कार्य करने के पूर्व हानि लाभ पर विचार अवश्य करो। किसी का तिरस्कार मत करो। यथायोग्य विनय करना सीखो। अच्छा बोलो अन्यथा मौन श्रेष्ठ है। धर्म अध्यात्म से जुड़कर जीवन जीयो।

अहंकार का त्याग करना होगा
स्वस्थ, सुखद, शांतिपूर्ण आनंदित जीवन के लिए संभल-संभल कर जीने की आवश्यकता है। महकते उपवन बनो, चंदन की तरह सुगंधित बनो, मिश्री की तरह मधुर बनो, दीप की भांति उज्जवल बनो। अहंकार छोड़कर प्रेम पूर्वक जियो। गिरना नहीं उठना सीखो। क्रोध से बचो, व्यवहार कुशल बनो, उपकारी का उपकार मत भूलो, तोड़ना नहीं जोड़ना सीखो, संग्राम से बचो, समझौता करना सीखो। विरोध छोड़ो गुणग्राही बनो।

अंधाधुंध दौड़ में संभलना जरूरी
विचार शून्य जीवन का अंत दुखद ही होता है। वर्तमान में पाश्चात्य की अंधी दौड़ में व्यक्ति अंधाधुंध दौड़ रहा है, होश गुम है, जीवन सिसक रहा है, लक्ष्य अज्ञात है,पल-पल आयु नष्ट हो रही है, यौवन क्षणभंगुर है, फिर भी आदमी संभल नहीं पा रहा है। न भोजन का बोध है न सोने की सुध, अंधाधुंध दौड़ते-दौड़ते दम तोड़ रहा है आदमी।