
दुर्ग . सीमांकन रिपोर्ट बनाने के लिए 5 हजार रुपए रिश्वत लेने वाले दुर्ग के तत्कालीन तहसीलदार चंद्रेश साहू (55 वर्ष) को न्यायालय ने चार साल कैद की सजा सुनाई। विशेष न्यायाधीश गरिमा शर्मा (एसीबी) ने उसे रिश्वत मांगने के लिए चार साल और रिश्वत लेने के लिए चार साल कैद के सजा से दंडित किया। न्यायालय ने उस पर 80 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया।
यह घटना 11 साल पुरानी है। तहसीलदार चंद्रेश साहू ने सीमांकन रिपोर्ट बनाने के लिए दुर्ग निवासी मनोहर ज्ञानचंदानी से ५ हजार रुपए रिश्वत मांगी थी। मनोहर की शिकायत पर एसीबी ने ३० जुलाई २००७ को रिश्वत लेते पकड़ा था। रिश्वत की रकम के साथ तहसीलदार को उसके कार्यालय में ही रंगे हाथ पकड़ा था।
इस मामले में तहसीलदार को दो माह तक जेल में रहना पड़ा था। पहला जमानत आवेदन तत्कालीन विशेष न्यायाधीश नीलमचंद सांखला ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि तहसील कार्यालय भी एक न्यायालय है। न्यायालय में बैठकर इस तरह का कृत्य करना गंभीर अपराध है। इस टिप्पणी को सही मानते हुए हाईकोर्ट ने भी जमानत आवेदन निरस्त कर दिया।
जमानत आवेदन पर दो गैर लोगों ने लगाई थी आपत्ति
दूसरे जमानत आवेदन पर शहर के ऐसे दो लोगों ने आपत्ति लगाई थी जिनका इस प्रकरण से कोई वास्ता नहीं था। आपत्ति करने वालों का कहना था कि वे भी तहसीलदार द्वारा प्रताडि़त हैं। इसलिए उसे जमानत नहीं मिलनी चाहिए। विलंब करने के उद्देश्य से बचाव पक्ष शिकायतकर्ता का प्रतिपरीक्षण नहीं कर रहा था। दो वर्ष तक इंतजार करने के बाद न्यायालय ने प्रतिपरीक्षण कार्यवाही समाप्त कर दी। बाद में बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट के आदेश पर कराया। शिकायतकर्ता का प्रतिपरीक्षण किया।
पकड़ाने के बाद जेल दाखिला होते ही तहसीलदार जिला अस्पताल में भर्ती हो गया। तब जिला अस्पताल में अलग से जेल वार्ड था। अस्पताल में ही उसके लिए घर से चाय नाश्ता आता था। यह बात सार्वजनिक होते ही विशेष लोक अभियोजक विजय कसार ने मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट की मांगी थी। इसके बाद जिला अस्पताल प्रशासन ने उसे आनन फानन में डिस्चार्ज कर जेल भेज दिया।
अपने और शिकायतकर्ता का नार्को टेस्ट की मांग
तहसीलदार साहू ने अपने बचाव में दो बचाव साक्ष्य भी प्रस्तुत किया, लेकिन एक गवाह ने अभियोजन की कहानी का समर्थन कर दिया। वर्ष 2017 में सुनवाई के दौरान आरोपी ने खुद का और शिकायतकर्ता मनोहर का नार्को टेस्ट कराने की मांग की थी। जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
एसीबी के अधिकारियों ने अपना वेशभूषा बदलकर रेड कार्रवाई की थी। एसीबी के अधिकारी ग्रामीण बनकर तहसील कार्यालय पहुंचे थे। इसके बाद भी तहसीलदार कार्यालय में एसीबी के अधिकारियों को देखते ही पहचान गया और रिश्वत की रकम को टेबल के नीचे फेंक दिया।
अभियोजन स्वीकृति के लिए अलग से प्रकरण चलाया गया
न्यायालय में प्रकरण को प्रस्तुत करने में अभियोजन को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। पांच वर्ष तक संबंधित विभाग ने अभियोजन स्वीकृति नहीं दी थी। स्वीकृति के अभाव में एसीबी अभियोग पत्र प्रस्तुत नहीं कर पा रहा था। बाद में न्यायालय के माध्यम से अभियोजन स्वीकृति के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति को पत्र लिखा गया। पत्र के आधार पर एसीबी को चालान प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई। इसके लिए न्यायालय में बतौर गवाह छत्तीसगढ़ शासन के विधि सचिव सामंत राय व राजस्व विभाग के सचिव केआर पिस्दा को न्यायालय आना पड़ा था।
फैसला सुनाए जाने के बाद भेजा जेल
न्यायालय ने फैसला सुनाए जाने के बाद दोषी तहसीलदार को जेल भेजने का आदेश दिया। उसे सजा तीन साल से अधिक की मिली है इसलिए उसे जमानत का लाभ नहीं मिला। तीन साल तक की सजा मिलने पर दोषी जमानत के लिए तत्काल अर्जी लगा पेश कर सकता है।
विशेष लोक अभियोजक विजय कसार ने बताया कि एसीबी ने २३ गवाहों की सूची पेश की थी। हमने 9 गवाहों का बयान दर्ज कराया। सभी गवाहों ने एसीबी की कहानी का समर्थन किया। दो-दो विभाग के प्रमुख सचिव गवाही देने कोर्ट आए। हमने तर्क दिया कि प्रकरण गंभीर है और रिश्वत मांगना और लेना दोनों प्रमाणित है।
Published on:
14 Apr 2018 11:19 am
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