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एक डॉक्टर से परामर्श के बजाए दूसरे से भी क्रास चेक कराए, अन्यथा लाखों का लगेगा चूना

टीएमटी टेस्ट का गलत रिपोर्ट जारी करने पर जिला उपभोक्ता फोरम ने अपोलो बीएसआर हॉस्टिल के डायरेक्टर को दोषी ठहराते हुए 3,16,550 रुपए हर्जाना लगाया है।

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Forum decision

सीने में दर्द की शिकायत पर एक अस्पताल ने निगेटिव, तो दूसरे ने 70 फीसदी ब्लाकेज बताया, फोरम ने लगाया तीन लाख हर्जाना

दुर्ग. ह्दय संबंधी बीमारी के लिए कराए गए टीएमटी टेस्ट का गलत रिपोर्ट जारी करने पर जिला उपभोक्ता फोरम ने अपोलो बीएसआर हॉस्टिल के डायरेक्टर को दोषी ठहराते हुए तीन लाख 16 हजार 550 रुपए हर्जाना जमा करने का निर्देश दिया है। इसके लिए जिला उपभोक्ता फोरम की अध्यक्ष मैत्रेयी माथुर, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये व लता चंद्राकर ने एक माह की मोहलत दी है। कुल राशि में टीएमटी टेस्ट के लिए ली गई राशि 1550 रुपए, मानसिक कष्ट के लिए तीन लाख और पांच हजार वाद व्यय शामिल है। परिवाद बालाजी नगर खुर्सीपार निवासी गोपाल प्रसाद सिंह (57 वर्ष) ने लगाया था।

1550 रुपए में टीएमटी टेस्ट कराया
परिवाद के मुताबिक 2017 में गोपाल प्रसाद को सीने में दर्द और श्वास लेने में तकलीफ हुई। उसने तत्काल डॉ. सुरेन्द्र कुमार यादव से चेकअप कराया और दवाइयां ली। इलाज के दौरान डॉ. यादव ने सुझाव दिया था कि वह टीएमटी टेस्ट कराए। गोपाल प्रसाद अपोलो अस्पताल में 1550 रुपए में टीएमटी टेस्ट कराया। वहां के डॉक्टर ने रिपोर्ट निगेटिव दी। रिपोर्ट के बाद डॉ. यादव ने रोगी के लक्ष्ण को देखते हुए हृद्य रोग विशेषज्ञ से परीक्षण कराने की सलाह दी।

ब्लाकेज की जानकारी बाद में मिली
दवाई लेने के बाद तकलीफ कम नहीं हुई। प्रार्थी ने स्पर्श हॉस्पिटल में डॉ जयराम अय्यर से चेकअप कराया। प्रांरभिक जांच के बाद स्पर्श अस्पताल में टीएमटी टेस्ट कराया। तब हृदय में ७० प्रतिशत ब्लाकेज होना बताया गया। रिपोर्ट के आधार में उसे तत्काल भर्ती कर एन्जियोग्राफी व एंजियोप्लास्टी की गई। इलाज में कुल २.५० लाख खर्च हुई। इलाज के बाद डॉक्टरों ने बताया कि पूर्व में कराई गई जांच और रिपोर्ट सही नहीं थी।

बचाव में कहा
सुनवाई के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने लिखित में तर्क दिया कि प्रार्थी ने टीएमटी टेस्ट कराया था। रिपोर्ट कम्प्यूटर द्वारा पीलोडेड प्रोग्राम से निकलता है। रिपोर्ट से केवल ग्राफ आता है। वे सही या गलत का फैसला नहीं लेते। रिपोर्ट को पहले अस्पताल के विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह देते हैं, लेकिन परिवादी ने ऐसा नहीं किया। रिपोर्ट लेने के बाद वह विशेषज्ञ से सलाह नहीं ली। अगर विशेषज्ञ से सलाह लेता तो स्थिति स्पष्ट हो जाती। परिवादी के पास इस बात का प्रमाण नहीं कि उसने अस्पताल के विशेषज्ञ को अपना रिपोर्ट दिखाया है। इसलिए परिवाद को खारिज किया जाए।

फोरम का निष्कर्ष
फोरम ने फैसले में कहा कि इलाज के लिए जांच रिपोर्ट आवश्यक है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे इलाज संभव है। अगर जांच रिपोर्ट गलत हो तो जीवन संकट में आ जाता है।