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यूरिया का देशी जुगाड़-गौमूत्र, दावा-पांच साल से प्रयोग, हर बार बेहतर पैदावार

यूरिया के संकट से प्रदेशभर के किसान जूझ रहे हैं। ऐसे में इसका देशी जुगाड़ सामने आया है। पाटन के ग्राम अचानकपुर के किसान रोहित साहू ने इसका विकल्प खोज निकाला है। किसान का दावा है कि यूरिया के विकल्प के रूप में गौ-मूत्र का उपयोग किया जा सकता है। पांच साल में दस फसलों पर प्रयोग के आधार पर किसान का दावा है कि इससे यूरिया की तुलना में बेहतर पैदावार हो रहा है।

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यूरिया का देशी जुगाड़-गौमूत्र, दावा-पांच साल से प्रयोग, हर बार बेहतर पैदावार

यूरिया की जगह गौमूत्र का पांच साल से प्रयोग कर रहा किसान रोहित

जैविक खेती में हाथ आजमाकर राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके रोहित साहू बताते हैं कि उन्होंने खुद के खेतों में गौ-मूत्र के प्रयोग के साथ इसके प्रभावों को लेकर गहन अध्ययन किया। इसके आधार पर कब कितनी मात्रा में गौ-मूत्र का छिड़काव किया जाए तय किया। इसमें तीन साल से ज्यादा समय लगे। अब वे यूरिया की जगह गौ-मूत्र के इस्तेमाल से ही धान और गेहूं की खेती कर रहे हैं। इसमें बेहतर परिणाम मिल रहा है। उन्होंने बताया कि फूल की स्थिति को छोड़कर गौ-मूत्र का प्रयोग कभी भी किया जा सकता है। यह सामान्य यूरिया से कहीं बेहतर व फायदेमंद है।


खुद झेला संकट, तब आजमाया हाथ
जैविक खेती और विविध प्रयोगों के लिए राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान प्राप्त कर चुके रोहित बताते है कि उन्होंने यूरिया संकट का दुष्परिणाम झेला तब उन्होंने गौ-मूत्र के प्रयोग पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बताया कि यूरिया नहीं मिलने पर गेहूं की फसल में गौ-मूत्र डाला। इसमें बेहतर परिणाम आया। इसके बाद से उन्होंने यूरिया का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया है।


जैविक खेती के लिए चला रहे मुहिम
रसायनिक कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से चिंतित रोहित जैविक खेती को लेकर भी मुहिम चला रहा है। रोहित वर्ष 2013 में जैविक खेती शुरू की। तब जिले में एक-दो किसान ही प्रायोगित तौर पर जैविक खेती करते हैं। अब जिले के 2700 से ज्यादा किसान 8000 एकड़ से ज्यादा में जैविक खेती कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर किसान ऐसे हैं जो रोहित की प्रेरणा से जैविक खेती से जुड़े हैं।


गांव-गांव जाकर किसानों प्रशिक्षण
रोहित किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण भी देते हैं। वे किसानों के समूह के साथ खुद के खर्च पर सेमीनार, प्रशिक्षण, गोष्ठी आदि का आयोजन करते है। लोगों को जैविक खाद, कीटनाशक, बीज आदि भी उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने बताया कि वे एक अभियान से जुड़कर पाटन के 20 गांवों के किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं।


गौ-मूत्र का इस तरह प्रयोग की सलाह
0 10 दिन की फसल में 700 एमएल/स्प्रेयर (15 लीटर पानी)
0 20 दिन की फसल में 1400 एमएल/स्प्रेयर
0 30 दिन की फसल में 2100 एमएल/स्प्रेयर
0 40 दिन की फसल में 3000 एमएल/स्प्रेयर
0 50 दिन या उससे अधिक में 3800 एमएल/स्प्रेयर


गौ-मूत्र के उपयोग से यह भी फायदे
0 सख्त हो चुकी जमीन को मुलायम करता है।
0 जमीन में केचुओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है।
0 गोमूत्र छिड़कने के बाद पानी नदी-नाले में जाने से कोई प्रदूषण नहीं।
0 छिड़काव करने वाले के स्वास्थ्य पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं।
0 दुर्गंध के कारण जंगली सूअर फसल को नुकसान नहीं पहुंचाता।
0 जहरमुक्त अनाज का उत्पादन, जो इम्यूनिटी पावर को बढ़ाता है।
0 जैव विविधता और पर्यावरण के लिए अत्यंत उपयोगी।


कारगर लेकिन उपलब्धता मुश्किल
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक वी जैन का कहना है कि फसल की बोनी से लेकर पैदावार तक ग्रोथ के लिए पोषक तत्वों की जरूरत होती। आमतौर पर रसायनों का उपयोग कर इसकी पूर्ति कर ली जाती है। ये पोषक तत्व गौ-मूत्र, गोबर, वर्मी कम्पोस्ट में भी होते हैं। ऐसे में गौ-मूत्र का उपयोग यूरिया के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। फर्क इतना है कि यूरिया के उपयोग से एकमुश्त और त्वरित 46 फीसदी नाइट्रोजन पौधों का मिल जाता है। जबकि गौ-मूत्र से दशमलव तीन से चार फीसदी की दर से धीरे-धीरे मिलता है। यह कारगर है, लेकिन उपलब्धता के लिहाज से थोड़ा मुश्किल टास्क है।