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सरकारी स्कूल की इस टीचर ने अपने जज्बे से बदल दी दिव्यांग शेखर की जिंदगी, कैसे जरूर पढि़ए…जिंदादिली की कहानी

शेखर के साथ कोई चमत्कार नहीं हुआ। यह सब बच्चे में आत्मविश्वास पैदा करने वाली उसकी टीचर आरती बंछोर की मेहनत से संभव हो सका।

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दुर्ग

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Dakshi Sahu

Aug 01, 2018

PATRIKA

सरकारी स्कूल की इस टीचर ने अपने जज्बे से बदल दी दिव्यांग शेखर की जिंदगी, कैसे जरूर पढि़ए...जिंदादिली की कहानी

भिलाई. दस साल का दिव्यांग शेखर दो माह पहले तक जमीन पर घिसटाकर चलता था, अब पैरों पर चलता है, खेल-कूद करता है। जिस किसी ने भी पहले इस अशक्त व मानसिक दिव्यांग बच्चे को देखा होगा, वे इस बात पर शायद ही यकीन करें, मगर यह सच है। शेखर के साथ कोई चमत्कार नहीं हुआ। यह सब बच्चे में आत्मविश्वास पैदा करने वाली उसकी टीचर आरती बंछोर की मेहनत से संभव हो सका।

भिलाई से करीब 15 किलोमीटर दूर ग्राम करंजा के शासकीय प्राथमिक स्कूल की कक्षा दूसरी में पढऩे वाला शेखर जन्म से ही दिव्यांग है। दिमागी रूप से कमजोर होने के कारण अपने पैरों पर ठीक से खड़ा नहीं हो पाता था। दोनों हाथों के सहारे जमीन पर घिसट- घिसटकर चलने वाला शेखर को अब ज्ञान के साथ-साथ अपनी शिक्षिका की ममता और दुलार का स्पर्श भी मिल रहा है।

उम्मीद से अच्छा बदलाव आया
आरती बताती हैं कि महज डेढ़ महीना हुआ है शेखर के साथ उनको। वह जब पहली पास होकर दूसरी कक्षा में आया तो दिनभर अपनी जगह चुपचाप बैठा रहता था। उन्होंने शेखर पर खास ध्यान देना शुरू किया और मात्र डेढ़ महीने में उनकी उम्मीद से कहीं अधिक शेखर में बदलाव आने लगा।

अब तो वह अन्य बच्चों की तरह खेल-कूद करता है। प्रार्थना में शामिल होता है और व्यायाम व प्राणायाम भी करता है। इसके साथ ही अन्य बच्चों से इसी प्रश्न का उत्तर पूछो तो खुद भी हाथ खड़ा करके उत्तर देने की कोशिश करता है।

माता-पिता आते रोज स्कूल छोडऩे
शेखर को अब भी रोज उनके पिता शिवकुमार यादव या मां सुधा यादव गोद में लेकर स्कूल लाते हैं। लेकिन स्कूल आने के बाद अब वह चलता है। आरती बेहद दुलार करती पर कभी-कभी थोड़ी सख्ती से भी पेश आती है ताकि वह अपने पैर पर ही चलकर उसके पास पहुंचे। शेखर भी कभी गिरता है, कभी खुद संभलता है, इस बीच उसकी फेवरेट टीचर आकर उसे थाम भी लेती है।

आरती की कोशिश में पूरा स्टाफ है साथ
आरती की इस नेक पहल पर पूरा स्टॉफ भी उसका साथ दे रहा है। प्रधानपाठिका अलोसिया एक्का ने भी आरती का हौसला बढ़ाया। वे बताती हैं कि उन्होंने आरती को समझाया है कि शेखर कॉपी में कुछ भी लिखे पर उस पर राइट का निशान लगाएं। क्योंकि राइट चिन्ह देखकर शेखर बहुत गदगद हो जाता है। बाकी स्टाफ भी शेखर पर वैसा ही स्नेह लुटाने लगा है।

माता-पिता ने छोड़ दी थी उम्मीद
शेखर के पिता शिवकुमार कहते हैं कि उनका बेटा पढ़-लिख सकेगा, इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी इसीलिए नौ साल तक स्कूल में भर्ती भी नहीं कराया। आरती मैडम के कारण अब उसका बेटा बहुत ही चंचल हो गया है। अच्छे से बातचीत भी करने लगा है। उन्हें पूरा भरोसा है भगवान ने मेरे साथ नाइंसाफी की तो क्या हुआ, मेरा बेटा काबिल इंसान जरूर बनेगा।

कल जल्दी आबे
छुट्टी की घंटी बजते ही बाकी सभी बच्चे अपना बस्ता समेटकर भागने लगते हैं, तब शेखर आरती के पास आकर छत्तीसगढ़ी में बोलता है कल जल्दी आबे। यह रोज की बात है। आरती किसी दिन छुट्टी में हो तो दूसरे दिन नाराज हो जाता है कि वे कल क्यों नहीं आई थी?