22 अप्रैल 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कमाल के अर्थशास्त्री थे महात्मा गांधी, लंदन में रुपए बचाने के लिए करते थे यह काम

महात्मा गांधी एक बेहतरीन अर्थशास्त्री भी थे। वो इतने मित्तव्ययी थे कि कम से कम खर्च करने में यकीन करते थे।

2 min read
Google source verification

image

Saurabh Sharma

Oct 02, 2018

Mahatma Gandhi

कमाल के अर्थशास्त्री थे महात्मा गांधी, लंदन में रुपए बचाने के लिए करते थे यह काम

नई दिल्ली। आज देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिवस है। वैसे तो हम सभी उनके बारे में बचपन से पढ़ते और सुनते हुए आर रहे हैं। लेकनि आज हम जो आपको बताने जा रहे हैं वो ना तो आपने कहीं पढ़ा होगा और ना ही सुना होगा। महात्मा गांधी एक बेहतरीन अर्थशास्त्री भी थे। वो इतने मित्तव्ययी थे कि कम से कम खर्च करने में यकीन करते थे। यह भी देखते थे कि उस कम खर्च में उनका गुजारा हो रहा है या नहीं। उनका पूरा अर्थशास्त्र रुपया बचाने को लेकर था। जब वो लंदन में वकालत की पढ़ाई कर रहे थे तो वो ऐसा काम करते थे कि जिसे कोई भारतीय करने में संकोच करेगा। आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर रुपया बचाने के लिए वो क्या करते थे।

पैदल चलने में यकीन करते थे गांधी
रुपए बचाने और अपने अर्थशास्त्र के अनुसार कम से कम रुपयों को खर्च करने की आदत के चलते लंदन में वकालत की पढ़ाई के दौरान वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का नहीं करते थे। इसकी जगह वो पैदल चलना पसंद करते थे। तब उनके पास ज्यादा पैसा नहीं हुआ करता था, लिहाजा वह कई मील तक पैदल चलकर पैसा बचाया करते थे। बाद में उन्होंने इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया।

आजादी की लड़ाई में भी दिखाया अपना अर्थशास्त्र
जब गांधी जी साउथ अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने यहां पर भी अपने अर्थशास्त्र को नहीं छोड़ा। वो यहां भी रोजाना 18 किलोमीटर पैदल चलते थे। दांडी मार्च के 24 दिन की यात्रा के दौरान वो करीब 15 किलोमीटर रोजाना चले थे। 1913 से 1938 के 25 सालों के अंतराल में लगभग 80 हजार किलोमीटर पैदल ही सफर किया। इतने में तो दुनिया दो का बार चक्कर आसानी से लगाया जा सकता है।

इस बात पर केंद्रित था गांधी जी का अर्थशास्त्र
वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार महात्मा गांधी का अर्थशास्त्र कम उपभोग पर केंद्रित था। वो कम से कम संसाधनों में गुजारा करने में यकीन करते थे। उनका मानना था कि कम संसाधनों में गुजारा करने से अधिक से अधिक लोगों का गुजारा चलाया जा सकता है।