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शिक्षा क्षेत्र से ही बदलेगी देश की तस्वीर

दरअसल 2011 में तत्कालीन सरकार के सिविल सेवाओं की प्रारंभिक परीक्षा पर अंग्रेजी लाद देने के दुष्परिणाम आज तक हावी हैं।

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जयपुर

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Sunil Sharma

Jun 07, 2019

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- प्रेमपाल शर्मा, लेखक व प्रशासक

खुशी की बात यह है कि 30 मई को नई सरकार के शपथ ग्रहण करने से पहले ही 100 दिन के जो लक्ष्य निर्धारित किए गए, उनमें शिक्षा को भी स्थान दिया गया है। देखा जाए तो नई सरकार और शिक्षा का नया सत्र साथ-साथ शुरू हो रहे हैं। यदि सरकार वास्तव में देश की तस्वीर बदलने के लिए गंभीर है और जनता के लिए उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप काम करना चाहती है तो शिक्षा से बेहतर दूसरा क्षेत्र नहीं हो सकता। नेल्सन मंडेला से लेकर दुनिया के हर राजनीतिक नेता, विचारक ने बड़े परिवर्तन के लिए शिक्षा के महत्व को समझा है। पूरे देश में इस समय दाखिले की हलचल है। स्नातक, स्नातकोत्तर, इंजीनियरिंग, कानून प्रबंधन, डॉक्टरी आदि हर क्षेत्र में। लेकिन गौर कीजिए सभी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले की प्रवेश परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा है। 27 मई को देश के विख्यात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा थी, लेकिन इसमें वही सफल हो सकता है जो अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा हो।

क्या चंपारण, छत्तीसगढ़, भुज, अजमेर, तेलंगाना, लखनऊ से लेकर लातूर का विद्यार्थी, जो अपनी-अपनी भाषाओं में पढ़ा है, कभी जेएनयू में दाखिले के बारे में सोच सकता है? बिहार के एक छात्र अंकित दुबे ने कुछ वर्ष पहले बताया था कि उसने बिहार से राजनीति शास्त्र ऑनर्स में स्नातक किया था। जेएनयू में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा में लगातार दो बार बैठने के बावजूद भी इसलिए सफल नहीं हुआ कि वह अंग्रेजी में उत्तर नहीं दे सकता था। हर मंच पर ऐसे विद्यार्थी आवाज उठाते, अनुरोध करते रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। अच्छा हो, नई सरकार न केवल जेएनयू, बल्कि दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत सभी लॉ यूनिवर्सिटी आदि कालेजों में भी प्रवेश परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को जगह दे।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि मोदी और शाह की जोड़ी की सफलता में सबसे अधिक योगदान उनकी अपनी भाषा हिंदी-गुजराती के सहज प्रवाह का है, जन-जन तक उसी के मुहावरे और बोली में पहुंचने की क्षमता का है। 2014 में भी भाषा की क्षमता के आधार पर ही उन्होंने देश का दिल जीता था। यहां केवल चुनाव जीतने का प्रश्न नहीं है। पिछली बार जब मोदी प्रधानमंत्री बने, सर्वोच्च अंग्रेजीदां नौकरशाह भी रातों-रात अपनी बात हिंदी में समझने समझाने लगे थे। हालांकि दिल्ली की फाइलों पर अब भी अंग्रेजी उसी तरह हावी है। नई सरकार से अपेक्षा है कि भारतीय भाषाओं के लिए कुछ सार्थक कदम उठाए जाएं।

संघ लोक सेवा आयोग पर अंग्रेजी का साया बहुत गहरा है। हाल ही घोषित सिविल सेवाओं के परिणाम भारतीय भाषाओं के एकदम खिलाफ गए हैं द्ग मात्र चार प्रतिशत। दरअसल 2011 में तत्कालीन सरकार के सिविल सेवाओं की प्रारंभिक परीक्षा पर अंग्रेजी लाद देने के दुष्परिणाम आज तक हावी हैं। आयोग की अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं जैसे वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, चिकित्सा सेवा में भी भारतीय भाषाओं की शुरुआत तुरंत की जाए। वरना अंग्रेजी और अमीरी के गठजोड़ से सिविल सेवाएं अंग्रेजी और अमीरी के द्वीप बनकर रह जाएंगी। क्या यह उस जनादेश के खिलाफ नहीं होगा, जिसका आधार जनता से वोट मांगने के लिए इस्तेमाल की गई भाषा थी।

पूरे शिक्षा जगत की तस्वीर कई स्तरों पर बदलने की जरूरत है। उचित तो यही होगा पाठ्यक्रमों में कुछ शब्द, कुछ अध्याय मात्र बदलने की परंपरा से मुक्ति पाते हुए कुछ बड़े परिवर्तनों की ओर बढ़ा जाए। हर पैमाने पर हम अमरीका, चीन से लेकर यूरोप के मुकाबले बहुत पीछे हैं। विकास का रास्ता केवल विज्ञान की बेहतर शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, तर्कशक्ति के बूते ही संभव है। अतीत के किसी कालखंड में हमारी उपलब्धियां रही होंगी, लेकिन हम बहुत दिनों तक अतीत के नशे में नहीं रह सकते। हमें तुरंत विज्ञान शिक्षा, शोध के लिए कदम उठाने होंगे। सिर्फ इंजीनियरिंग कॉलेज संस्थान खोलना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्ता सुधारी जाए, वरना उन्हें बंद किया जाए। ये नकली संसथान देश की गरीब जनता को शिक्षा के नाम पर ठग रहे हैं।

अफसोस की बात है कि पिछले दिनों कॉलेज लेबोरेट्री लगभग गायब हो चुकी हैं, न संसाधन हैं, न शोध के प्रति छात्रों-शिक्षकों में झुकाव। मत भूलिए डीएनए के खोजकर्ता वैज्ञानिक वाटसन, डार्विन के विकासवाद को आगे बढ़ाने वाले मिलर आदि ने ऐसी खोजें अपने कॉलेज के दिनों में ही की थीं। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 500 संस्थानों में शामिल होने की बातें भी अभी हवा में ही हैं। इसके लिए विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रक्रिया दुरुस्त करने की जरूरत है। तीन वर्ष पहले पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन समिति ने यूपीएससी जैसा भर्ती बोर्ड बनाने की सिफारिश की थी। उस पर तुरंत अमल करने की जरूरत है। आज हमारे उच्च शिक्षा संस्थान यदि डूब रहे हैं, तो सही भर्ती, प्रशिक्षण की खामियों के चलते। वंशवाद ने भारतीय राजनीति को जितना बर्बाद किया है, विश्वविद्यालयों को और ज्यादा।

शिक्षा में सुधार के लिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों की व्यवस्था भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। क्या बिना पुस्तकालय के किसी स्कूल-कॉलेज या आधुनिक समाज की कल्पना की जा सकती है? पुस्तकालय गांव-शहर में खोलने की बातें तो दशकों से हो रही हैं, लेकिन इस सरकार को एक मजबूत इरादे के साथ ऐसी बातों को हकीकत में बदलना होगा। अमरीका और दूसरे देशों में शिक्षा की बेहतरी के लिए पुस्तकालयों ने एक विशेष भूमिका निभाई है और निभा रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता के लिए ही हमारे लाखों छात्र हर साल लाखों-करोड़ों की फीस देकर अमरीका, ऑस्ट्रेलिया व कनाडा की तरफ रुख कर रहे हैं। नई सरकार को इसे रोकने के लिए तुरंत समयबद्ध कदम उठाने होंगे। दुनिया की सबसे ज्यादा नौजवान पीढ़ी, अच्छी शिक्षा के दम पर ही देश को आगे ले जाने में समर्थ हो सकती है।

देश में हैं 907 विश्वविद्यालय
राज्य विश्वविद्यालय - 399
डीम्ड यूनिवर्सिटी - 126
केंद्रीय विश्वविद्यालय - 48
निजी विश्वविद्यालय - 334
(यूजीसी के अनुसार)