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इस स्कूल में बड़े से बड़े शरारती बच्चे भी सुधर जाते हैं, ये हैं इसका राज

शरारती बच्चों को यहां डांटने-फटकारने की बजाय ध्यान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। स्कूल ने पाया कि ध्यान से बच्चों में काफी सुधार आया।
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Sunil Sharma

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Updated: 16 Sep 2018, 9:56 AM IST

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भारत में ध्यान और योग गुरुकुल काल से ही विद्यार्थियों की शिक्षा का अहम हिस्सा रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन के साथ ही ये अच्छी प्रथाएं प्रार्थना सभा तक सीमित होकर रह गईं। लेकिन प्राचीन शिक्षा पद्धतियों के ये तौर-तरीके आज भी कारगर हैं। स्कूलों में सजा देने के तौर-तरीकों में अब काफी बदलाव आ गए हैं। लेकिन सजा और डांट-फटकार बच्चों में अपेक्षित परिवर्तन तुरंत नहीं ला पाते।

इस परिस्थिति के एकदम उलट, बाल्टीमोर का रॉबर्ट डब्ल्यू. कॉलमैन प्राथमिक स्कूल अन्य स्कूलों से सजा देने के मामले में कुछ अलग है। शरारती बच्चों को यहां डांटने-फटकारने की बजाय उन्हें ध्यान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कॉलमैन स्कूल में सजा का यह कमरा रंग-बिरंगी रोशनी और दीपकों से सजा हुआ है।

यहां बच्चों को सजा के रूप में ध्यान करने के साथ पर्यावरण संरक्षण, साफ-सफाई और अन्य सामाजिक कामों में भी लगाया जाता है। ताकि वे अपने गुस्से पर काबू रखना सीख सकें। शुरुआती परेशानियों के बाद स्कूल प्रबंधन ने पाया कि ध्यान से बच्चों की शरारतों और प्रदर्शन में आश्चर्यजनक रूप से सुधार आया है। कक्षाओं में बच्चों की उपस्थितियां पहले से ज्यादा हो गईं और परीक्षा परिणाम में भी सुधार देखने को मिल रहे हैं।

स्कूल में गत वर्ष एक भी बच्चे को स्कूल से नहीं निकाला गया। इस साल भी ये सिलसिला बना हुआ है। शोध साबित करते हैं कि ध्यान और योग से मानसिक दृढ़ता, भावनाओं पर नियंत्रण और स्मरण शक्ति तेज होती है। लंबे समय तक अपना ध्यान केन्द्रित करने में भी लाभ होता है। यह पहल बॉल्टीमोर शहर की संस्था द हॉलिस्टिक लाइफ फाउण्डेशन की ओर से की गई है। १० सालों से संस्था स्कूल में हॉलिस्टिक मी कार्यक्रम चला रही है। कार्यक्रम के समन्वयक किर्क फिलिप्स का कहना है कि बच्चे इस कार्यक्रम में खुशी से सम्मिलित हो रहे हैं।