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घिसीपिटी परिपाटी छोड़ शिक्षक ढूंढें इनोवेटिव आइडिया

हर बच्चे का कोई न कोई फेवरिट टीचर जरूर होता है। कोशिश होनी चाहिए कि बच्चे अपने शिक्षकों को प्रेरणा मान कर स्कूल का रुख करें।

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Sunil Sharma

Sep 05, 2018

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- रेणु हुसैन, शिक्षक, कवियत्री

एक समय शिक्षा देने का माध्यम गुरुकुल हुआ करते थे। बड़े से बड़ा राजा भी अपनी संतान को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने भेजता था। वे राजा होने के बावजूद शिक्षक का पूरा मान-सम्मान करते। बच्चों को भी गुरु का पूरा सम्मान करने की सीख दी जाती थी। फिर गुरुकुल का स्थान स्कूलों, कॉलेजों ने ले लिया। आज शिक्षक-छात्र संबंधों में होने वाले ह्रास भी चिंता का विषय है। जब मैं किसी छात्र द्वारा शिक्षक के अपमान की घटना सुनती हूं तो बेहद दुख होता है। मुझे लगता है आज मानसिक स्तर पर भी ग्लोबल वार्मिंग हो रही है।

हम अपने बच्चों को एक शिक्षक और अभिभावक के रूप में यही वार्मिंग दे रहे हैं। बच्चे परिवार में झगड़े, बुरी आदतें, गाली-गलौच देखते हैं और वैसा ही करते हैं। उनमें बच्चों में इनटॉलेरेंस और बदला लेने की भावना बढ़ रही है। शिक्षक या सहपाठी की कोई बात बच्चे बर्दाश्त नहीं कर पाते। उनमें धैर्य और माफ करने की भावना खत्म हो रही है। माता-पिता और शिक्षक का सम्मान घटता जा रहा है। अगर छात्र शिक्षक और अभिभावक का सम्मान करना भूल गया तो वह सफल होकर भी असफल है।

बच्चों की मानसिक स्थिति को देखते हुए अब कई स्कूलों में हैप्पीनेस करीकुलम शुरू किया गया है। ताकि बच्चों को खुश रहना सिखाया जा सके। यानी अब शिक्षक अपने छात्रों को खुशियां भी बांटने लगे हैं। दूसरी तरफ जब कोई बच्चा असफल हो जाने पर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है तो हमें अध्यापक होने के नाते बहुत गिल्टी महसूस होती है कि आखिर कमी कहां रह गई। शिक्षा देना एक सतत् प्रक्रिया है। शिक्षक राष्ट्र और व्यक्तित्व का निर्माण करता है ।

बच्चों को रोशनी की एक किरण चाहिए होती है। जो उन्हें रास्ता दिखाए, बताए कि पढक़र-लिखकर उन्हें क्या मिलेगा? जब तक शिक्षक उन्हें इस बात का अहसास नहीं करवाएंगे तो बच्चे स्कूल से कतराते रहेंगे। शिक्षक का बच्चों को स्कूल के प्रति आकर्षित करना जरूरी है। एक शिक्षक सफल तभी होता है जब वह एक ऐसे बच्चे को स्कूल ले आए और उसमें पढऩे के प्रति रुचि जगा दे जो शिक्षा से दूर भागता हो। हर बच्चे का कोई न कोई फेवरिट टीचर जरूर होता है। कोशिश होनी चाहिए कि बच्चे अपने शिक्षकों को प्रेरणा मान कर स्कूल का रुख करें। इसलिए बच्चों को उन तरीकों से पढ़ाना चाहिए जिससे वे रुचि लेकर पढ़ें। हर रोज नए इनोवेटिव आइडियाज के जरिए बच्चों में रीडिंग और लर्निंग की रुचि जगानी चाहिए। साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से बातों-बातों में बच्चों में असफलता को स्वीकार करने का साहस भी भरना चाहिए।

एक वाकया मुझे याद है। बिहार में नट का तमाशा दिखाने वाला एक खानाबदोश लडक़ा अक्सर हमारे घर आता था। मैं उसे हमेशा कहती थी कि तुम्हें पढऩा चाहिए। यह सब काम तुम्हारे माता-पिता को करने चाहिए। मैं उसे हमेशा प्रोत्साहित करती थी। बहुत सालों बाद मेरे पास एक दिन एक फोन आया। उधर से बोलने वाले लडक़े ने कहा कि मैं बीएसएफ में भर्ती हो गया हूं। कुछ करने की प्रेरणा मुझे आपसे ही मिली। मुझे हैरानी हुई। न जाने उसने कब दसवीं, बारहवीं और कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली थी और फिर फोर्स में भी शामिल हो गया। तब मुझे अहसास हुआ कि सही मार्गदर्शन से जिंदगी कभी भी बदली जा सकती है।