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Bhognipur Assembly Constituency : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी इस सीट से हारे थे चुनाव, जानिए कब-कब किसे मिली जीत

Bhognipur Assembly Constituency : कानपुर देहात की करीब 3.29 लाख से अधिक मतदाताओं की संख्या वाली भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र के ज्यादातर गांव यमुना और सेंगुर नदी के बीहड़ क्षेत्र में आते है। इस सीट से वर्ष 1957 में शोषित समाज दल के नेता रामस्वरूप वर्मा पहली बार निर्दलीय विधायक बने थे। रामस्वरुप वर्मा के बाद वर्ष 1962 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से राज नारायण मिश्रा चुनाव जीते थे।  

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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

Nov 06, 2021

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Bhognipur Assembly Constituency : लखनऊ. कानपुर देहात की भोगनीपुर विधानसभा सीट में आजादी के बाद से अब तक किसी भी एक दल का वर्चस्व नहीं रहा है। वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी साल 2007 में भोगनीपुर विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे। भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े महामहिम तीसरे स्थान पर रहे थे। माना जा रहा है कि यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनाव में एक बार फिर इस सीट पर इतिहास दोहरा सकता है और इस क्षेत्र की जनता को नया माननीय मिल सकता है।

1957 में पहली बार मिली थी निर्दलीय प्रत्याशी को जीत

कानपुर देहात की करीब 3.29 लाख से अधिक मतदाताओं की संख्या वाली भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र के ज्यादातर गांव यमुना और सेंगुर नदी के बीहड़ क्षेत्र में आते है। इस सीट से वर्ष 1957 में शोषित समाज दल के नेता रामस्वरूप वर्मा पहली बार निर्दलीय विधायक बने थे। रामस्वरुप वर्मा के बाद वर्ष 1962 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से राज नारायण मिश्रा चुनाव जीते थे। 1962 के चुनाव के बाद हुए परिसीमन में भोगनीपुर विधानसभा को सीट आरक्षित कर दिया था। इस सीट से चार बार कांग्रेस, तीन बार बहुजन समाज पार्टी, दो बार जनता दल, दो बार समाजवादी पार्टी चुनाव जीती है। 2017 के विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पहली बार यहां से चुनाव जीती है।

1985 के बाद से कांग्रेस को नहीं मिली जीत

कानपुर देहात जिले की सबसे पुरानी भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत यहां पर सबसे अधिक अनुसूचित वर्ग और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। 2017 से पहले भाजपा के प्रत्याशी इस सीट से हमेशा तीसरे या चौथे स्थान पर रहे हैं। वर्ष 2012 तक यहां होने वाले चुनाव में एक बार बसपा तो एक बार को जनता ने मौका दिया है। 1957 में हुए सबसे पहले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय रामस्वरुप वर्मा, 1962 में कांग्रेस के राजनारायण मिश्रा, 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के केशरी लाल, 1969 में कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद कुरील, 1974 में भारतीय क्रांति दल से केशरी लाल, 1977 में जनता पार्टी से मौजी लाल कुरील ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राधेश्याम कोरी ने चुनाव जीता था। राधेश्याम कोरी के बाद कांग्रेस आज तक इस विधानसभा सीट में जीत नहीं हासिल कर सकी है।

2017 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी को मिली जीत

पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के द्वारा जनता दल का गठन करने के बाद इस सीट से 1989 से 1991 तक लगातार दो बार प्यारेलाल संखवार जनता दल से विधायक रहे। 1993 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार इस सीट पर कब्जा जमाया था। बीएसपी के टिकट पर भगवती सागर ने यहां से चुनाव जीता था। 1996 में कांग्रेस छोड़ बसपा में गए राधेश्याम कोरी फिर भोगनीपुर से विधायक चुने गए। 2002 में हुए विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी से अरुणा कुमारी कोरी, 2007 में बसपा से रघुनाथ प्रसाद संखवार विधायक बने थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर सपा के योगेंद्र पाल सिंह यादव यहां से चुनाव जीतने में सफल रहे थे और 2017 के चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार अपना परचम फहराया। भाजपा के टिकट पर इस सीट से विनोद कुमार कटियार ने पहली बार चुनाव जीता।

2007 में विधानसभा का चुनाव हारे थे राष्ट्रपति कोविंद

भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र में आजादी के बाद से यहां की जनता को भारतीय जनता पार्टी रास नहीं आई। इस क्षेत्र से भाजपा 2012 तक हमेशा तीसरे या फिर चौथे नबंर रही। इतना ही 2007 के विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी इस सीट से चुनाव हार गए थे। इस चुनाव में 26 हजार से अधिक वोट पाकर वे तीसरे नंबर पर रहे थे। जबकि पहले नंबर पर बसपा और दूसरे नंबर पर सपा रही थी।

2022 के चुनाव में भाजपा की राह नहीं होगी आसान

भोगनीपुर विधानसभा सीट से 2017 के विधानसभा में मोदी लहर में जीत हासिल करने वाले भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा विधायक विनोद कटियार के लिए प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा के आम चुनाव में इस सीट से जीतना इस बार कठिन नजर आ रहा है। पंचायत चुनाव में विधायक की भूमिका को लेकर लोगों में काफी नाराजगी है। इसके अलावा विधायक के रवैये से संगठन के नेताओं में खासी नाराजगी है, जो मौजूदा विधायक के लिए भारी पड़ सकती है। संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यदि इस चुनाव में पार्टी प्रत्याशी नहीॆं बदलती है, तो फिर भाजपा के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव में भोगनीपुर विधानसभा सीट जीतना आसान नहीं होगा।